साथ हूँ तुम्हारे

गुजरे सालों से

भीड़ में गुम होता एक शख्स…
मेरे कुछ रंग अपने चेहरे में लगाये|
मुझसा दिखता है|
ओझल होता उसका साया घुलता जाता है लोगों में|

मुझे अंदर खलिश सताती है|
सोचता हूँ भाग के उसे पकड़ लूँ|
कुछ उसके रंग अपने चेहरे पे लगा लूँ|

रोकता हूँ खुद को..
कहता हूँ बस शायद मोहब्बत है|
इश्क की दीवानगी है|
मैं तो सयाना हूँ अब|

जितना ओझल होता है वो…
उतना कुछ मुझे अंदर जकड़ता है|
मेरे पैर जम से गए हैं|
अपना हाथ देखा तो समझा ये रंग दर्द का है|

मेरे ज़हन में एक लौ सच्चाई की जलती है|
जहाँ इश्क, मोहब्बत, वफ़ा नहीं पहुँचती अक्सर..
उन गमों की सदा सुनता हूँ|

मेरे पैरों में खून पिघलता है..
मेरी सांसें उसका नाम चीखती हैं|
में भाग रहा हूँ तुझ तक आने के लिए|
सारी भीड़ में तू मुझे साफ दिखता है|

मैं नहीं खोऊंगा तुझे|
सुन रहे हो ना तुम मेरे क़दमों की आहट|

पलट के देखो, मैं साथ हूँ तुम्हारे…. हमेशा|

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  • दिल से लिखी गयी है…दिल को छोने बाली है ये…..
    ….
    ….
    यह पोस्ट केवल सफल ब्लॉगर ही पढ़ें…नए ब्लॉगर को यह धरोहर बाद में काम आएगा…

  • सुंदर कविता है।

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