स्याही के धब्बे

स्याही के कुछ धब्बे सा हूँ मैं..
तुम इनमे मतलब ना ढूंढो,
कोई छिडक गया था बेइरादा इन्हें|

बस उलझे लफ़्ज़ों का भवर है,
जिनमे डूबती है कुछ कागज की कश्तियाँ|

संभालो, तुम्हारी उँगलियों से भवर ना टूट जाए..
इनमे घुटना ही मेरी इन्तेहा है|
स्याही के कुछ धब्बे सा हूँ मैं..

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  • Chandrama

    Brillient! Its like a lifetime lived in few simple words. “Syahi ke kuch dhabbon sa hoon main, inme tum matlab na dhoondo” What a thought!

  • raghulaughter

    बस उलझे लफ़्ज़ों का भवर है,

    जिनमे डूबती है कुछ कागज की कश्तियाँ !

    बहुत सुंदर शब्द वीर जी..

    एकदम सच….

    शुक्रिया आपका वर्षों बाद आपकी रचना मैं अपने मेल बॉक्स में रिसीव कर रहा हूँ .

    मुझको तो लगा कि मैंने आपको खो दिया …

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