वो आवारा

मंज़िलें तडपती रहीं,
रास्ते मचलते रहे|
वक्त पलट के देखता रहा,
उस अवारे को ..

उसकी शायद मंजिल ही तलाश थी..
रुसवा कर चुका था वो जज़्बात को…

देखता था वो धुंद में तस्वीर कोई…
उसकी फितरत ही थी रास्तों को नापने की…

ख्यालों की दुनिया उसकी अपनी थी…
उसे सदाओं का आसरा ना था..

खुला आसमा उसे पुकारता..
वो खो जाता बादलों में..

वो आवारा |

0.00 avg. rating (0% score) - 0 votes