कुछ ख्वाब न देखें

कुछ ख्वाब न देखें तो गुज़ारा नहीं होता, जो हमारा है हकीक़त में.. हमारा नहीं होता| गर उसकी नज़र से मेरी नज़र मिल जाए, दुनिया में इससे खूबसूरत नज़ारा नहीं होता| कुछ ख्वाब न देखें तो गुज़ारा नहीं होता… तुम तो बहते बहते समंदर में जा मिले, सच है के दरिया का कोई किनारा नहीं

कोई धार तो मुझे बहा ले!

कोई धार तो मुझे बहा ले, कब तक बैठूं नदी किनारे| ऊब गया हूँ देख-देख कर, बहता पानी, रुके किनारे| विचारों का प्रवाह निरंतर, मैं की खोज में भटकता अंतर| या इस कंकड़ को जल बना ले, या इस कंकड़ को तल बना ले| कोई धार तो मुझे बहा ले, कब तक बैठूं नदी किनारे…

अब भीगेंगे सावन में

अब भीगेंगे सावन में सर से पांव तक, गीली मिट्टी के महक से.. तेरे दामन की छाओं तक| काली सड़कों पर पानी भी काला है, कोई ले चले हमें.. इस शहर से उस गाँव तक| अब भीगेंगे सावन में सर से पांव तक… ये दौड़ किसी पागलपन से कम तो नहीं, आदमी भागता है एक

ये कैसा लहजा है

तेरी दिल्लगी से आ पड़ती है मेरी जान पर, ये कैसा लहजा चढ़ गया है तेरी जुबान पर| अब हुआ है तो इज़हार ए वफ़ा भी कर ले, रुकता नहीं है देर तक तीर कमान पर| ये कैसा लहजा चढ़ गया है तेरी जुबान पर… कोई दौड़ नहीं ये राह-ए-जीस्त है ‘वीर’, खुद को थामना

कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में

कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में, खुदको पीछे छोड़ आये.. अपनों की तरक्की में| मुद्दत का थका हुआ था, तो आख लग गयी, सारा मंज़र ही बदल गया.. एक झपकी में| कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में… रिश्ता धुंधला गया, वक़्त के कोहरे में, खबर ए रुखसत निगल गए.. एक सिसकी में| कुछ

आँखें खोल कर देख!

ज़हन से ख्याल झाड़ कर देख, डर्र की आँख में झाँक कर देख| जिंदिगी से खुद को मांग कर देख, अपने वजूद को पहचान कर देख| लम्हे को कभी बाँध कर देख, वक़्त के दरिये को थाम कर देख| हदों की सरहद को लांघ कर देख, हिम्मत को सर पर बाँध कर देख| खुद को

कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ

हर दिन अपने लिए एक जाल बुनता हूँ, कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ| हर रोज़ इम्तिहान लेती है जिंदिगी, हर रोज़ मगर मैं मोहब्बत चुनता हूँ| कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हू… बहुत दूर चला आया हूँ कारवाँ से, तन्हा रास्तों में एक हमसफ़र ढूंढता हूँ| कभी ज़हन,

जिसकी इजाज़त दिल न दे

जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये, इन हाथों से अपना खेल तमाम मत कीजिये| बेसबब नहीं होता.. कुछ भी यहाँ, खुद से गद्दारी का ये काम मत कीजिये| जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये| डर्र हो या मोहब्बत हो किसी से, अपनी शक्सियत को दुसरे का गुलाम मत कीजिये|

दिल बहुत ज़लील हुआ

लम्हा मोहब्बत से अना में तब्दील हुआ, उसे दुनिया से मांग कर.. दिल बहुत ज़लील हुआ| तेरी बेरुखी मंज़ूर हो चली थी हमें, तेरा सच कहना रिश्ते की आखरी कील हुआ| उसे दुनिया से मांग कर दिल बहुत ज़लील हुआ… मेरे जज़्बात सबब से अनजान ही रहे, मेरा बयां ए वफ़ा गुनाहगार की दलील हुआ|

इलज़ाम तूफानों पर आता रहा

मैं दिल का गुबार उड़ाता रहा, इलज़ाम तूफानों पर आता रहा| मैं छोड़ आया वो शहर ए वफ़ा, वो गली.. वो मोहल्ला बुलाता रहा| इलज़ाम तूफानों पर आता रहा… मुद्दत हो गयी उसको टूटे हुए, वो ख्वाब मगर.. जगाता रहा| इलज़ाम तूफानों पर आता रहा… उसका छुपाने का हुनर देखिये, वक़्त ए रुखसत भी मुस्कुराता