जिंदिगी रूठी हुई

है लम्हें का अरमान मुझसे लिपट जाने का, देख रही है उसे हसरत से.. जिंदिगी रूठी हुई| मैं अपने ख़वाब जग ज़ाहिर नहीं करता, ये सलतनत है मेरी सभी से लूटी हुई| देख रही है उसे हसरत से जिंदिगी रूठी हुई.. उसने संभाल कर अलमारी में दफना दिया, वो जो एक चूड़ी थी उस दिन

रोज़ देखता हूँ!

सियासत का वहशी नंगा नाच.. रोज़ देखता हूँ, हाथों में पत्थर, पैरों में कांच.. रोज़ देखता हूँ| कभी इसके सर तो कभी उसके सर टांग दिया, हर नए दिन एक नया सरताज.. रोज़ देखता हूँ| हाथों में पत्थर, पैरों में कांच.. रोज़ देखता हूँ| तुम मोदी चिल्लाते हो, या फिर राहुल जपते हो, मैं तुम्हारे

मगर कोई कमी है

मैं तुझे अपनी आँखों में भर तो लूँ ज़रा, न जाने क्यों वक़्त को, गुज़रने की हड़बड़ी है| गुज़र जायेगा मगर.. फिर से आएगा ज़रूर, ये जीवन दुःख और सुख की कड़ी दर कड़ी है| न जाने क्यों वक़्त को, गुज़रने की हड़बड़ी है… हैरत है के अब भी जिंदा हूँ किस तरह, देख जिंदिगी

हर शक्स के हाथ में कटोरा है!

हर शक्स के हाथ में कटोरा है, जिसके पास जितना है.. थोड़ा है| सांस – सांस मुजरिम बनी है, मेरी हर सांस ने मुझे तोड़ा है| हर शक्स के हाथ में कटोरा है… हसरत ए ख़ुशी में भागता है वहशी, आदमी.. आदमी कहाँ है? घोड़ा है! हर शक्स के हाथ में कटोरा है… मुझसे मांग

चंद लम्हों को

चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं, बनाने वाले गमों को भी, खुशियाँ बना लेते हैं| न पंख बचे और अब न होसला उड़ने का, शाम होते ही, हम कागज़ पर तितलियाँ बना लेते हैं| चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं… घुटने टेक दिए हैं हर हसरत ने आते-जाते, अपने अंदर के

आमद

खैर इस बार उसका होना अजीब न था.. हाँ अजीब था उसका बेवक्त आना| सहर से सतह पर कोई नमी के निशां नहीं थे| और सुबह से बच्चों की किलकारियां कानों में शहद घोल रही थी| एक खूबसूरत दिन अंगड़ाई लेकर बिस्तर से उठा था| दोपहर की भाग-दौड ने फुर्सत को बैठने का मौका ही नहीं

मुश्किल वक्त

जर्जर हौसला मरम्मत मांगता है, मुश्किल वक्त हिम्मत मांगता है| उम्र भर नेकी न की गयी मगर, अब बुढ़ापे में जन्नत मांगता है| मुश्किल वक्त हिम्मत मांगता… वफ़ा के सौदे में वो सितमगर मुझसे, शर्त में बेशर्त मोहब्बत मांगता है| मुश्किल वक्त हिम्मत मांगता… काफ़िर बेटों का वो खुदा-परस्त बाप, औलादों के लिए मन्नत मांगता

तुम और मैं

राह-ए-उल्फत में अपना ठिकाना न आया, मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया| साज़-ए-जिंदिगी ने सुर ऐसा छेडा, मुझे गाना न आया, तुम्हें गुनगुनाना न आया| मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया… बच्चों की तरह गिले भी बड़े हो गए, मुझे भुलाना न आया, तुम्हें मिटाना न आया| मुझे रूठना न आया, तुम्हें

खींच लाया हूँ

समंदर से समंदर तक खींच लाया हूँ, तन्हा साहिल को अंदर तक खींच लाया हूँ| मैंने खुद जलाया है अपनी कई हसरतों को, एक सिकंदर को कलंदर तक खींच लाया हूँ| तन्हा साहिल को अंदर तक खींच लाया हूँ… तिनका – तिनका रोज़ उछालता हूँ गुबार उसका, ज़मीं के सितारों को अंबर तक खींच लाया हूँ|

अंगार ढूँढता हूँ

कैसा कर्ज़दार हूँ के सूद लिए साहूकार ढूँढता हूँ, जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अंगार ढूँढता हूँ| न शहर बचा, न घर.. और न घर में रहने वाले, तन्हाई की धुप में सर छुपाने को दीवार ढूँढता हूँ| जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अंगार ढूढता हूँ… एक मुद्दत गुज़र गयी