नहीं देखी जाती

तुम्हारी आँखों में हमसे वहशत नहीं देखी जाती, अपने हों या गैर हमसे नफरत नहीं देखी जाती| वो मेरी वफ़ा का रोज़ इम्तिहान क्यों लेता है? क्या उससे मेरी बेशर्त मोहब्बत नहीं देखी जाती? अपने हों या गैर हमसे नफरत नहीं देखी जाती… पलक-पलक हर आँख में क्यों चुभता है भला, इस ज़माने से हमारी कुर्बत

ताकत बहुत चाहिए

खामोश रहने के लिए, ताकत बहुत चाहिए, ज़ुल्म सहने के लिए, आदत बहुत चाहिए| यूँ तो मुझे भी हासिल है अदा रूठने की, रूठे रहने के लिए, अदावत बहुत चाहिए| ज़ुल्म सहने के लिए, आदत बहुत चाहिए… उम्र भर हम तुझे दुआओं में मांगते रहे, मगर असर के लिए, इबादत बहुत चाहिए| ज़ुल्म सहने के

जिंदिगी को चख कर देखा

जिंदिगी को चख कर देखा तो बेस्वाद लगी, गुज़रे सब सालों की फसल बरबाद लगी| एक-एक करके सारा वक्त लूट लिया सबने, रिश्तों की ज़िम्मेदारियाँ लालची दामाद लगी| जिंदिगी को चख कर देखा तो बेस्वाद लगी… शहर की रोशन सड़कों में तन्हाई का बसेरा है, हमें मोहल्लों की स्याह गलियां आबाद लगी| जिंदिगी को चख

छोड़ दिया है

अब हमने धक्का देना छोड़ दिया है! रिश्तों को कांधों पर ढोना छोड़ दिया है | या हम दाना हुए या तुम में वो बात नहीं, या इश्क ने ही जादू टोना छोड़ दिया है | रिश्तों को कांधों पर ढोना छोड़ दिया है… कोई पूछे तो अब भी तेरा ही नाम लेते हैं, मुद्दत

मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं

मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं, मेरी तरह वो तुम्हें पसंद आये तो नहीं | क्या लफ़्ज़ों को है गिला-शिकवा बहुत ? क्या कहीं वो भी मेरे सताये तो नहीं | मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं… सहरा तक पहुँचती हर एक मौज से पूछो, क्या उसने कोई सफीने डुबाये तो नहीं | मेरे लफ्ज़

फ़िराक से पहले

आखरी वस्ल था लंबे फिराक से पहले, दोनों खामोश थे दिल-ए-बेबाक से पहले | अब के जो फूँक से उड़ा देते हो मुझे, मैं जो शोला था मुश्त-ए-ख़ाक से पहले | आखरी वस्ल था लंबे फिराक से पहले… पहचान नहीं पाता हूँ इस दिल को मैं, ये जो गुलिस्तां था हज़ारों चाक से पहले |

तेरी मामूली सी बातों में

तेरी मामूली सी बातों में, न-मामूली सा प्यार छुपा है | खामोश गहरी आँखों में, मीठा सा इकरार छुपा है | न तुमने कोई कसमें दी, न मैंने कोई अहद किया | मगर दोनों के दरमियाँ, अनकहा सा ऐतबार छुपा है | तेरी मामूली सी बातों में, न-मामूली सा प्यार छुपा है… दो जिंदिगियाँ वैसे

पैरों में तेरे बेडियाँ हैं और हाथ मेरे बंधे हुए

क्या तुमसे बयां करूँ सबब-ए-हिज्र हमनफस, पैरों में तेरे बेडियाँ हैं और हाथ मेरे बंधे हुए | कहने को एक जिंदिगी दोनों के पास है मगर, इन मुस्कुराते चेहरों के पीछे हैं दिल जले हुए | पैरों में तेरे बेडियाँ हैं और हाथ मेरे बंधे हुए… एक आंधी चली और गुबार से उड़ गए हम, ज़माना

समझाया न करो

किसी को कुछ समझाया न करो, लोगों को ठोकर से बचाया न करो | वो अपनी गलती के मालिक हैं, बेवजह अपना खून जलाया न करो | किसी को कुछ समझाया न करो… तजुर्बे का निचोड़ अपनी हलक में रखो, अपना फ़साना जुबां तक लाया न करो | किसी को कुछ समझाया न करो… खाई

फिर रहे हैं

कीमती जिंदिगी लुटाते फिर रहे हैं, हम खुद को बहलाते फिर रहे हैं | तुम्हारा होने की सज़ा मिली है हमें, ज़र्रा ज़र्रा खुद को मिटाते फिर रहे हैं | हम खुद को बहलाते फिर रहे हैं… मुझे ज़माने भर में बाट आया है वो, हर शख्स से खुद को बचाते फिर रहे हैं |