एक आग है मेरे अंदर

बस खामोश हूँ मगर बेज़ुबां नहीं हूँ, एक आग है मेरे अंदर सिर्फ धुआं नहीं हूँ | पत्थर की लकीर नहीं हैं उसूल मेरे, दिल रखता हूँ, गुलाम ए इमां नहीं हूँ | एक आग है मेरे अंदर सिर्फ धुआं नहीं हूँ… वक्त आने पर बता देंगे कूबत क्या है, काबलियत से वाकिफ हूँ, बदगुमां

पसंद

सच, क्या तुझे भी सच सुनना पसंद है ? मैं झूठ हूँ, मुझे सच बुनना पसंद है | गाँठ जीस्त की खोल रहा है गुज़रता वक्त, मैं लम्हा हूँ, मुझे उलझना पसंद है | उम्मीद की डोर से पिरोई है आरजू मगर, मैं हसरत हूँ, मुझे बिखरना पसंद है | मेरे बाद तुझे तलब न

अधिकार नहीं मिलता

कहीं माँ का दुलार नहीं मिलता, कहीं बाप का प्यार नहीं मिलता | कुछ अभागि औलादें ऐसी भी हैं, जिन्हें अपना अधिकार नहीं मिलता | उम्र भर ढूंढते फिरते हैं बेगानों में, मगर कोई तलबगार नहीं मिलता | जैसे किसी वीरान पड़े मकां को, बरसों किरायेदार नहीं मिलता | मौत से एक लम्हें का भी,

मोहब्बत कम से होती है

दुआ मांगते बहुत हैं पर इबादत चंद से होती है, इश्क बहुतों से हुआ पर मोहब्बत कम से होती है | तुम मेरी आवाज़ को यूँ नज़रंदाज़ मत किया करो, हर इंकलाब की आगाज़ ज़ुल्म ओ सितम से होती है | इश्क बहुतों से हुआ पर मोहब्बत कम से होती है… कभी मेरे इस ज़हन

वक्त से पहले

वक्त से पहले ही मिल गयी मंजिल मुझे, और फिर न हुआ ताउम्र कुछ हासिल मुझे | मैं पूरा समंदर पी गया था लड़कपन में, फिर कभी दोस्त सा न मिला साहिल मुझे | और फिर न हुआ ताउम्र कुछ हासिल मुझे… और कोई नहीं बस एक ही खता हुई तुझसे, क्यों दे दिया तुने

निभा रहा था अब तलक

निभा रहा था अब-तलक वो मेरा किरदार नहीं है, आईने में जो शख्स है वो मेरा वफादार नहीं है | उस तक पहुँचते-पहुँचते खो दिया है खुद को, अब उस तक पहुंचा हूँ जो मेरा तलबगार नहीं है | आईने में जो शख्स है वो मेरा वफादार नहीं है… सबका अलग रास्ता है और सबका अपना

शर्त

मिलता है मगर बिछड़ने की शर्त पर, जिंदा तो है मगर मरने की शर्त पर | जिंदिगी तेरी अदा है या बेबसी मेरी, होसला मिलता है मगर डरने की शर्त पर | जिंदा तो है मगर मरने की शर्त पर… पल दो पल से ज़्यादा कहीं भी रुकता नहीं, वक्त अच्छा आता है गुजरने की

ये तुम हो के मुझे वहम हुआ है

ये तुम हो के मुझे वहम हुआ है, ये बस लफ्ज़ हैं या फिर तेरी दुआ है | मालूम होता है सर पर हाथ पहचाना सा, क्या फिर तुमने मेरी तस्वीर को छुआ है | ये तुम हो के मुझे वहम हुआ है… ख्वाब को कह दो बेवक्त आया न करें, अभी मैं मायूस हूँ

क्या बतायें के हाल कैसा है

क्या बतायें के हाल कैसा है, मुझे खुद से ये मलाल कैसा है| अब भी गुज़रे वक्त में जी रहा हूँ, कल क्या होगा? ये सवाल कैसा है! क्या बतायें के हाल कैसा है… जकड़े रहती है दिन भर बाँहों में, मतलबी दुनिया का बवाल कैसा है| क्या बतायें के हाल कैसा है… एक गाँठ

इन दिनों

तुम से आरजू मेरी कुछ नाराज़ है इन दिनों, खामोश लब में क़ैद, कोई राज़ है इन दिनों | जिंदिगी मगर थमी नहीं तुम्हारे बाद, अंजाम का दूसरा नाम, आगाज़ है इन दिनों | ग़ज़ल से रूठकर उस तक पहुँच भी जाऊं, मगर उन हाथों में सुखन का साज़ है इन दिनों | कभी दर्द