अब भीगेंगे सावन में सर से पांव तक, गीली मिट्टी के महक से.. तेरे दामन की छाओं तक| काली सड़कों पर पानी भी काला है, कोई ले चले हमें.. इस शहर से उस गाँव तक| अब भीगेंगे सावन में सर से पांव तक… ये दौड़ किसी पागलपन से कम तो नहीं, आदमी भागता है एक