बेवफाई

ये कैसा लहजा है

तेरी दिल्लगी से आ पड़ती है मेरी जान पर, ये कैसा लहजा चढ़ गया है तेरी जुबान पर| अब हुआ है तो इज़हार ए वफ़ा भी कर ले, रुकता नहीं है देर तक तीर कमान पर| ये कैसा लहजा चढ़ गया है तेरी जुबान पर… कोई दौड़ नहीं ये राह-ए-जीस्त है ‘वीर’, खुद को थामना

दिल बहुत ज़लील हुआ

लम्हा मोहब्बत से अना में तब्दील हुआ, उसे दुनिया से मांग कर.. दिल बहुत ज़लील हुआ| तेरी बेरुखी मंज़ूर हो चली थी हमें, तेरा सच कहना रिश्ते की आखरी कील हुआ| उसे दुनिया से मांग कर दिल बहुत ज़लील हुआ… मेरे जज़्बात सबब से अनजान ही रहे, मेरा बयां ए वफ़ा गुनाहगार की दलील हुआ|

मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं

मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं, मेरी तरह वो तुम्हें पसंद आये तो नहीं | क्या लफ़्ज़ों को है गिला-शिकवा बहुत ? क्या कहीं वो भी मेरे सताये तो नहीं | मेरे लफ्ज़ मुझसे पराये तो नहीं… सहरा तक पहुँचती हर एक मौज से पूछो, क्या उसने कोई सफीने डुबाये तो नहीं | मेरे लफ्ज़

समझाया न करो

किसी को कुछ समझाया न करो, लोगों को ठोकर से बचाया न करो | वो अपनी गलती के मालिक हैं, बेवजह अपना खून जलाया न करो | किसी को कुछ समझाया न करो… तजुर्बे का निचोड़ अपनी हलक में रखो, अपना फ़साना जुबां तक लाया न करो | किसी को कुछ समझाया न करो… खाई

फिर रहे हैं

कीमती जिंदिगी लुटाते फिर रहे हैं, हम खुद को बहलाते फिर रहे हैं | तुम्हारा होने की सज़ा मिली है हमें, ज़र्रा ज़र्रा खुद को मिटाते फिर रहे हैं | हम खुद को बहलाते फिर रहे हैं… मुझे ज़माने भर में बाट आया है वो, हर शख्स से खुद को बचाते फिर रहे हैं |

फिर से

जो मिले मेरे दिल को करार फिर से, तो मैं लिख दूं चंद अशार फिर से| न तलाश का इल्म है, न रास्तों की खबर, जिंदिगी हो गयी है बेकार फिर से| टूटे दिल को समेट रहा हूँ तिनका-तिनका, ताकि कर सको तुम टुकड़े हज़ार फिर से| तुम गए तो कोई पूछने वाला न बचा, अब

बर्दाश्त नहीं होती

मुझे ये कलाकारी, बर्दाश्त नहीं होती| ये नकाबों की बिमारी, बर्दाश्त नहीं होती| मैंने देखे हैं तुम्हारे कई सुन्दर रंग, मुझसे तुम्हारी अदाकारी, बर्दाश्त नहीं होती| मुझे ये कलाकारी, बर्दाश्त नहीं होती… हमने फूँका है खुद को वफ़ा में मगर, अब तंज की चिंगारी, बर्दाश्त नहीं होती| मुझे ये कलाकारी, बर्दाश्त नहीं होती… अब मुझसे मुंह फेर कर

ना मौका दिया सफाई का

कुछ यूँ हुआ किस्सा मेरी सुनवाई का, ना जवाब ही माँगा, ना मौका दिया सफाई का| कुछ नए अंदाज़ से मिल मुझसे हाकिम मेरे, मैं देख लूँ तुझमें, कोई रंग मसीहाई का| ना मौका दिया सफाई का… क्या कुछ नहीं है मुझमें गर तू गौर करे, तुमने सिर्फ हिसाब रखा मेरी बुराई का| ना मौका

कोई नहीं है यहाँ

अब पलटकर देखना छोड़ दे दिल मेरे, कोई नहीं है यहाँ तेरे नाज़ उठाने के लिए| अब जो जल कर खाक हुआ दामन मेरा, आये हैं चंद हबीब आग बुझाने के लिए| कोई नहीं है यहाँ तेरे नाज़ उठाने के लिए… बेबस हैं लकीरों के आगे हाथ मेरे, बस मांग रहे हैं दुआ क़ज़ा आने

गुज़रे सालों का

सवाल पूछ या जवाब दे, मेरे गुज़रे सालों का हिसाब दे| आईना बनकर सामने आ, मेरे हाथों का ना किताब दे|