Tag: बेवफाई

हम खामोश रहते हैं

ना जाने कैसी रंगत लाए हुनर अपना, हम खामोश रहते हैं, दुहाई नहीं देते| हाकिम को मेरे ज़ख्म दिखाई नहीं देते, इसलिए हम इल्ज़ामों पर सफाई नहीं देते| हम खामोश रहते हैं, दुहाई नहीं देते…

नज़र से गिराने का क्या फ़ायदा

एहद-ए-वफ़ा को निभाने का क्या फ़ायदा, मुझे मेरी नज़र से गिराने का क्या फ़ायदा| इंसान हूँ तो मुझमें दरारें होना जायज़ है, मेरी कच्ची दीवारें ढहाने का क्या फ़ायदा| मुझे मेरी नज़र से गिराने का क्या फ़ायदा… डह जाए जो एक परिंदे के पंख की हवा से, ऐसे कमज़ोर घर को बचाने का क्या फ़ायदा|

कोई मुझ जैसा

शहर तो छूट गया, घर भी टूट गया, कोई मुझ जैसा, मुझको ही लूट गया| बुलाता रहा उम्र भर, मनाता रहा उम्र भर, वो जो रूठा मुझसे, ज़माना ही रूठ गया| कोई मुझ जैसा, मुझको ही लूट गया… मैंने खुदा माना था, सबसे जुदा माना था, आईने पिघल गए, अक्स भी डूब गया| कोई मुझ

तिनका तिनका

क़त्ल हुआ एक और दिन का, मर रहे हैं तिनका तिनका| शर्त-ए-वफ़ा लेकर आये हैं, बेशर्त मैं हो गया जिनका| मर रहे हैं तिनका तिनका.. किसको कसूरवार कहे ‘वीर’, अब नाम ले तो किन किनका| मर रहे हैं तिनका तिनका..

बेरुखी अदा कब से हो गयी

बेरुखी अदा कब से हो गयी, गिला बददुआ कब से हो गयी| ऐतराज़ ना ज़ाहिर किया जो, ख़ामोशी रज़ा कब से हो गयी| बेरुखी अदा कब से हो गयी… कराह उठे हम ज़ख्मों से, चीख सदा कब से हो गयी| बेरुखी अदा कब से हो गयी… उस लम्हे का इल्म नहीं, जिंदिगी सज़ा कब से

कातिल बना गयी

मेरी कमज़ोरी मेरा दामन जला गयी, मेरी खुदी मुझे कातिल बना गयी| मेरी मोहब्बत शायद काफी ना थी, मेरी फितरत मुझे नाकाबिल बना गयी| मेरी खुदी मुझे कातिल बना गयी… तुम मेरे नुस्क ना संभाल पाये, मेरी आवारगी मुझे साहिल बना गयी| मेरी खुदी मुझे कातिल बना गयी… खुदा तुमने बस एक दिल ही तो

शब्दों का मदारी

शब्दों का मदारी समझते हो, ख़ामोशी को वफादारी समझते हो| रिश्तों में कोई प्यार नहीं है, इन्हें बस जवाबदारी समझते हो| शब्दों का मदारी समझते हो… हाँ सोचता हूँ हर पल तुम्हे, इसे मेरी बेरोज़गारी समझते हो| शब्दों का मदारी समझते हो… बस यूँ ही अनसुना कर देते हो, या कोई बात हमारी समझते हो|

नाराज़ तुमसे

कह दूं ये राज़ तुमसे, के मैं हूँ नाराज़ तुमसे| झूमते हो मेरे लफ़्ज़ों पर, छीन लूं ये साज़ तुमसे| के मैं हूँ नाराज़ तुमसे… ये कुर्बत है और फासला भी, जोड़ते हैं मुझे अलफ़ाज़ तुमसे| के मैं हूँ नाराज़ तुमसे… बेखुदी में फ़ना होगा ‘वीर’, अंजाम की होगी आगाज़ तुमसे| के मैं हूँ नाराज़

ख्वाब तुम्हारा तोड़ दूं

लाओ मैं ही ख्वाब तुम्हारा तोड़ दूं, बेवफा होकर दिल तुम्हारा तोड़ दूं| अपने ही तो जलाते हैं जिस्म चिता में, मैं ख्याल बनकर ज़हन तुम्हारा छोड़ दूं| फिर तुम्हे मिले ना मिले कोई रहनुमा, आज मैं ही रास्ता तुम्हारा मोड़ दूं|

मुझे और खोकला कर गए ना तुम

मेरे ख्यालों से भर गए ना तुम, मुझे और खोकला कर गए ना तुम| इतना सहम गए शीशे से क्यों, अपने अक्स से ही डर गए ना तुम| मुझे और खोकला कर गए ना तुम… मुझे दे कर जिंदिगी सज़ा में, खुद लम्हा लम्हा मर गए ना तुम| मुझे और खोकला कर गए ना तुम…