बेवफाई

बेवफ़ा मैं

अँधेरे कमरे का वो सिसकता आलम, खामोश रात में घुलती सिसकियाँ| दूर सुबह… मेरी तन्हाइयों को निहारती है| कल वो दिन, मेरे भटकते ख्यालों की नई सौगात| देखता हूँ खुदको रास्तों में गुम होते| फिर उसी मोड़ पर, वो मेरा इंतज़ार करती हुई| फिर भी मैं नहीं रूकूंगा| उसकी नज़रें मुझे तकती रहेंगी, और मैं

तुम्हें ज़माने की दुआ चाहिए

तुम और मैं, काफी नहीं है जिंदिगी के लिए, तुम्हें ज़माने की दुआ चाहिए| नादान मैं क्या समझ बैठा तेरे इश्क को, तुम्हें इस रात की सहर चाहिए|

मुझे बता

भूलूं तुझे किस क़दर, मुझे बता बिताऊं तन्हा कैसे ये सफ़र, मुझे बता| यूँ तो मिलते हो सबसे मुस्कुरा के, करोगे क्या जो मिला मैं अगर, मुझे बता| तू नहीं तो क्या हासिल इस ज़िन्दगी का, चलता जाऊं क्यों मगर, मुझे बता|