हकीकत

कुछ ख्वाब न देखें

कुछ ख्वाब न देखें तो गुज़ारा नहीं होता, जो हमारा है हकीक़त में.. हमारा नहीं होता| गर उसकी नज़र से मेरी नज़र मिल जाए, दुनिया में इससे खूबसूरत नज़ारा नहीं होता| कुछ ख्वाब न देखें तो गुज़ारा नहीं होता… तुम तो बहते बहते समंदर में जा मिले, सच है के दरिया का कोई किनारा नहीं

कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में

कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में, खुदको पीछे छोड़ आये.. अपनों की तरक्की में| मुद्दत का थका हुआ था, तो आख लग गयी, सारा मंज़र ही बदल गया.. एक झपकी में| कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में… रिश्ता धुंधला गया, वक़्त के कोहरे में, खबर ए रुखसत निगल गए.. एक सिसकी में| कुछ

ख्वाब देखा न करो

ख्वाब देखा न करो, खुली आँखों से, इसकी कीमत देनी होती है, अधूरी सांसों से| हकीकत बदलती नहीं बस धुंधला जाती है, लकीरें कहाँ मिटती हैं, किसी के हाथों से| ख्वाब देखा न  करो, खुली आँखों से… आदमी अकेला था और अकेला ही रहेगा, क्या उम्मीद लगाई है तुमने रिश्ते-नातों से| ख्वाब देखा न  करो, खुली आँखों से… सच को महसूस करो और सच रहने दो, इसे चेहरा न दो ज़माने की फरेब बातों से| ख्वाब देखा

पहचान तो हो

कद्र-ए-वफ़ा न सही मगर, कद्र-ए-इंसान तो हो, कम से कम तुम्हें अच्छे-बुरे की, पहचान तो हो| ये मुमकिन है के ना चीख पाओ, तुम ज़ुल्म के आगे, मगर ज़रूरी है के हलक में तुम्हारी, जुबान तो हो| कम से कम तुम्हें अच्छे-बुरे की, पहचान तो हो… बेदाग ना हो तुम्हारा खुदा ऐसा हो सकता है,

थोडा फासला ज़रूरी है

कुरबतें हैं फिर भी एक दूरी है, इश्क में थोडा फासला ज़रूरी है| सितम आपके सब सर आँखों पर, हमने तो आपकी हर सज़ा कबूली है| इश्क में थोडा फासला ज़रूरी है… लहरों से बहते रहने की फितरत, हुनर है उसका या मजबूरी है| इश्क में थोडा फासला ज़रूरी है… जब सब कह दिया उससे