जुदाई

मुश्किल

तुझको भुलाना भी मुश्किल, तुझसे दूर जाना भी मुश्किल| तेरे पास आना भी मुश्किल, कहीं और जाना भी मुश्किल| आशियाना भी मुअम्मा हुआ, दीवार सजाना भी मुश्किल, दीवार गिराना भी मुश्किल| तुझसे दूर जाना भी मुश्किल… यूँ रूठा है मेरा अक्स मुझसे, आँख मिलाना भी मुश्किल, आँख चुराना भी मुश्किल| तुझसे दूर जाना भी मुश्किल…

तेरी सादगी

बूंदों में सब डूब सा गया है, मुदत्तों में आज बादल पिघला है| और मैं तुमको अपने में समेटे, नम ज़हन को शाम होते देख रहा हूँ| इस साहिल से उस समंदर तक, जो दरमियाँ है, वही इस आंख से अश्क तक भर गया है| दिखता तो है कोई अक्स धुन्दला सा.. तुम हो या

तन्हा हम तेरे बिन

किसी बंद किताब के धुंधले किरदार से नज़र आते हैं, तन्हा हम तेरे बिन कितने पन्नों में बिखर जाते हैं| लफ़्ज़ों की कोई कड़ी उँगलियों से लिपट जाती है, जैसे हमें कुछ बिछड़े हुए साथ वापस बुलाते हैं| तन्हा हम तेरे बिन कितने पन्नों में बिखर जाते हैं… कोई फ़साना नहीं दस्तूर – ए –

बिछड़ा यार नहीं मिलता

खुदा भी शायद नाराज़ है हमसे, मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता| इसमें कहाँ पहले सी बात रही, अब शराबों से खुमार नहीं मिलता| मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता… मिलते हैं रिश्ते विरासत में यहाँ, हर रिश्ते में लेकिन प्यार नहीं मिलता| मिन्नतों से बिछड़ा यार नहीं मिलता… मिलती नहीं है मौत से मोहलत

कहीं खो जाऊँगा

पल में अक्स सा ओझल हो जाऊँगा, अनजाने ख्वाब सा कहीं खो जाऊँगा| खलिश भी ना होगी जुदाई की कोई, तुम्हारे ज़हन में ऐसा बस जाऊँगा| अनजाने ख्वाब सा कहीं खो जाऊँगा… हाथों की लकीरों को जब देखोगे कभी, इनमे कहीं तुम्हे मैं नज़र आऊँगा| अनजाने ख्वाब सा कहीं खो जाऊँगा… जब कभी सुनोगे हवाओं

रुखा सा लम्हा

रुखा सा लम्हा ले कर उसे, हम नम बना लिया करते हैं| तेरे बिना वक्त की सदियाँ, हम यूँ गुज़ार लिया करते हैं| याद जब खलिश सी लगती है, नाम तेरा पुकार लिया करते हैं|

नसीब ना हुआ

उन ग़ज़लों को स्याही का कफ़न नसीब ना हुआ, उन नज्मों को आवाज़ का मज़ार नसीब ना हुआ.. उन रिश्तों को नाम का लिबास, उन अश्कों को दामन-ए-यार.. नसीब ना हुआ.. उन कहानियों को याद का सहारा.. उन लम्हों को ज़ुल्फ़-ए-यार.. नसीब ना हुआ.. उन सावलों को जवाब, उन जवाबों को इंतज़ार… नसीब ना हुआ..

एक फासला ऐसा भी है

कोई मुझ जैसा भी है, कोई तुझ जैसा भी है| बस एक हाथ कि दूरी, एक फासला ऐसा भी है| कभी रुक जाता है थम के, कभी दरिया सा बहता भी है| एक फासला ऐसा भी है… कभी बुलंद होसलों सा बढता, कभी मायूस बैठा भी है| एक फासला ऐसा भी है… देखता रहेगा क्या

क्यों चलता है तू मेरे साथ

क्यों चलता है तू मेरे साथ … खो जा हवाओं में ..  बिखर जा फिज़ाओं में .. मैं मौसम हूँ बीत जाऊंगा … अगले बरस मुझे तिनका तिनका जोड़ेगा तू … क्यों चलता है तू मेरे साथ …

भीड़ यारों की

कोई बादल नहीं आसमान में, क्या आरजू सो गई है| नज़र आते हैं इतने साये, क्या तन्हाई हो गई है| महफ़िल कभी सज ना पाई तेरे बिन, भीड़ यारों की हो गई है|