खलिश

कभी घर नहीं आता..

यहीं कहीं तो था.. अब नज़र नहीं आता, सिर्फ ठिकाने मिलते हैं, कभी घर नहीं आता । कैसे बताऊँ किस मुश्किल से आ पहुंचा हूँ! मुसाफिर के साथ चलकर सफ़र नहीं आता । दिल में ज़रूर सुराख़ हो गया है वगरना, क्यों पहले की तरह अब भर नहीं आता | दर्द की दीवारें, फर्श, दरवाज़े

तराशा हुआ पत्थर हूँ

तराशा हुआ पत्थर हूँ, अब बस टूटना बाकी है, पुर्जे तो मेरे कर चुके हो, अब बस लूटना बाकी है| हर शक्स ईमारत ए सब्र के आखिरी छोर पर है, उम्मीद हार चुका है, अब बस कूदना बाकी है| तराशा हुआ पत्थर हूँ, अब बस टूटना बाकी है… राह में नज़र चुरा कर चले जाते

इलज़ाम तूफानों पर आता रहा

मैं दिल का गुबार उड़ाता रहा, इलज़ाम तूफानों पर आता रहा| मैं छोड़ आया वो शहर ए वफ़ा, वो गली.. वो मोहल्ला बुलाता रहा| इलज़ाम तूफानों पर आता रहा… मुद्दत हो गयी उसको टूटे हुए, वो ख्वाब मगर.. जगाता रहा| इलज़ाम तूफानों पर आता रहा… उसका छुपाने का हुनर देखिये, वक़्त ए रुखसत भी मुस्कुराता

खींच लाया हूँ

समंदर से समंदर तक खींच लाया हूँ, तन्हा साहिल को अंदर तक खींच लाया हूँ| मैंने खुद जलाया है अपनी कई हसरतों को, एक सिकंदर को कलंदर तक खींच लाया हूँ| तन्हा साहिल को अंदर तक खींच लाया हूँ… तिनका – तिनका रोज़ उछालता हूँ गुबार उसका, ज़मीं के सितारों को अंबर तक खींच लाया हूँ|

छोड़ दिया है

अब हमने धक्का देना छोड़ दिया है! रिश्तों को कांधों पर ढोना छोड़ दिया है | या हम दाना हुए या तुम में वो बात नहीं, या इश्क ने ही जादू टोना छोड़ दिया है | रिश्तों को कांधों पर ढोना छोड़ दिया है… कोई पूछे तो अब भी तेरा ही नाम लेते हैं, मुद्दत

अधिकार नहीं मिलता

कहीं माँ का दुलार नहीं मिलता, कहीं बाप का प्यार नहीं मिलता | कुछ अभागि औलादें ऐसी भी हैं, जिन्हें अपना अधिकार नहीं मिलता | उम्र भर ढूंढते फिरते हैं बेगानों में, मगर कोई तलबगार नहीं मिलता | जैसे किसी वीरान पड़े मकां को, बरसों किरायेदार नहीं मिलता | मौत से एक लम्हें का भी,

निभा रहा था अब तलक

निभा रहा था अब-तलक वो मेरा किरदार नहीं है, आईने में जो शख्स है वो मेरा वफादार नहीं है | उस तक पहुँचते-पहुँचते खो दिया है खुद को, अब उस तक पहुंचा हूँ जो मेरा तलबगार नहीं है | आईने में जो शख्स है वो मेरा वफादार नहीं है… सबका अलग रास्ता है और सबका अपना

सपने टूटते हैं

सपने टूटते हैं और फिर आहिस्ता संवर भी जाते हैं, हम एक जिंदिगी में कई बार जीते हैं, कई बार मर जाते हैं| इस दुनिया में कुछ भी पत्थर की लकीर सा नहीं है, वक्त सोते हुए करवट लेता है, और लोग बदल जाते हैं| सपने टूटते हैं और फिर आहिस्ता संवर भी जाते हैं…

उसी पुराने मर्ज़ से

नाज़ुक मिजाज़ी के शिकार हुए हैं हम, उसी पुराने मर्ज़ से बीमार हुए हैं हम | दिल में उठती हैं शिकायतें कई सोई हुई, एक ज़र्रे से उठके गुबार हुए हैं हम | न शराब और न आखें ही काम आएंगी, अपनी सकरी सोच के खुमार हुए हैं हम | बचपन हमारा अधूरा ही रह

पहुंचते – पहुंचते

अटका हुआ है ज़हन में कुछ बिखरा हुआ सा, कोई आरजू रह गयी है आवाज़ तक पहुंचते-पहुंचते | कुछ ऐसे ख्वाब भी देखे हैं इन आँखों ने, अश्क बन गए हैं जो जुबां तक पहुंचते-पहुंचते | इतनी शिद्दत से माँगा है आज मैंने उसको, आह हो गयी है दुआ खुदा तक पहुंचते-पहुंचते | मैं लिख रहा हूँ