Tag: खलिश

शब्दों के वार से

शब्दों के वार से अभिमान मरोड़ा गया, फिर मेरे आत्मसम्मान को तोड़ा गया| टूट के जब में गिरा अपनी नज़रों से, फिर मुझे रिश्तों की गोंद से जोड़ा गया| शब्दों के वार से… यही क्रम चलता रहा सालों साल निरंतर, फिर मुझे बीच मझधार अकेला छोड़ा गया| शब्दों के वार से… मुझे चैन न मिला

अंदाज़ मेरा मुझे

अंदाज़ मेरा मुझे बेगाना सा लगने लगा है, हर ख्याल कोई दुश्मन पुराना सा लगने लगा है| एक लम्हें में इतनी दूर चला आया हूँ सबसे, ये दिन भी गुजरा ज़माना सा लगने लगा है| अंदाज़ मेरा मुझे बेगाना सा लगने लगा है… अपनी हकीकत इतनी बार पढ़ली हमने ‘वीर’, अपना किरदार कोई फ़साना सा

गिला छोटा सा है मगर

इस रुसवाई में दर्द कम और सीख ज़्यादा है, गिला छोटा सा है मगर टीस ज़्यादा है| उसका होने की ख्वाइश है मुझे क्यों, जो मोहब्बत का कम और अपना मुरीद ज़्यादा है| गिला छोटा सा है मगर टीस ज़्यादा है… खैर वक्त के साथ मैं संभल ही जाऊँगा, अभी चोट नई है और अभी

मुझको पी गई शराब

हाथ ना लगाओ इसे, ये चीज़ है खराब, कुछ मैंने पी, कुछ मुझको पी गई शराब| मेरी बेखुदी का कोई क्या देगा जवाब, फिर आज मुझे तन्हा छोड़ गई शराब| कुछ मैंने पी, कुछ मुझको पी गई शराब… दर्द को पहना रखा है मुस्कुराहट का नकाब, जैसे ज़हर को अपने अंदर छुपा गई शराब| कुछ

आंख आंख बिखरे मयखाने हैं

लहरों में घुले कितने फ़साने हैं, साहिलों से हमारे रिश्ते पुराने हैं| हर लहर को खामोश ही पीते रहे, हम दीवाने थे, अब भी दीवाने हैं| अब पीने क्यों जायें बता ‘वीर’, आंख आंख बिखरे मयखाने हैं|

लडखडाना जायज़ है सँभालने के लिए

हालात मचलते हैं बदलने के लिए, लडखडाना जायज़ है सँभालने के लिए| जो थोडा तू मेरे इन हाथों में लिख गया, काफी है एक उम्र को तडपने के लिए| लडखडाना जायज़ है सँभालने के लिए… हर लड़ाई तेरी अपने आप ही से है, इलज़ाम ना दो किसी को बदलने के लिए| लडखडाना जायज़ है सँभालने

मलाल भी मुझे हर शाम हुआ

शक्ल हर दिन की कल जैसी रही, मलाल भी मुझे हर शाम हुआ| हकीकत है की भूलती नहीं मुझको, खुद अपनी हस्ती का मैं गुलाम हुआ| मलाल भी मुझे हर शाम हुआ… जो मिला था वो सफ़र के नाम हुआ, कोशिशों का देखिए क्या अंजाम हुआ| मलाल भी मुझे हर शाम हुआ… मुश्किल है हर

उखड जाता है

अब इस साज़ में आवाज़ ना कोई बाकी है, हर आहट से दिल अपना उखड जाता है| इतनी बार तोडा गया दिल अपना ‘वीर’, ज़ख्म एक सी लूँ तो दूसरा उधड जाता है| हर आहट से दिल अपना उखड जाता है…

आपसे दिलासा कब मांगता है

वीर आपसे दिलासा कब मांगता है, उसपे जो गुजरी है, वो ही जानता है| खबर है उसे अपनी काली शक्सियत की, कुछ सोच कर ही उजालों से दूर भागता है| वीर आपसे दिलासा कब मांगता है… तुम हाथ ना लगाओ गहरे ज़ख्मों को, फिर उभर आयेंगे, वो इन्हें खूब पहचानता है| वीर आपसे दिलासा कब

फीका खून है झूठी रवायतें

हर तजुरबे से चीखती शिकायतें, फीका खून है, झूठी रवायतें| देगा और क्या चारागर हमें, थोडा दिलासा, थोड़ी हिदायतें| फीका खून है, झूठी रवायतें… भीख अपनों से मांगता है ‘वीर’, कभी प्यार की, कभी इनायतें| फीका खून है, झूठी रवायतें…