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वीर हर शय से बेगाना है

कहाँ जाना है और क्यों जाना है, बेमतलब के सवाल है, वीर हर शय से बेगाना है| मैं बदला नहीं ज़र्रा भी मुद्दत में, दिल अरसे से दीवाना था, दिल आज भी दीवाना है| वीर हर शय से बेगाना है… मुझको किसी से कोई वास्ता ना रहा, इस बवाल से मुझे दूर, बहुत दूर जाना

जाने क्या पाना चाहता है

जाने कहाँ जाना चाहता है, जाने क्या पाना चाहता है| क्यों रखता है उम्मीद फिर, क्यों चोट खाना चाहता है| जाने क्या पाना चाहता है… थोड़ा अँधेरा ही रहने दे आज, क्यों घर जलाना चाहता है| जाने क्या पाना चाहता है… क्यों मुर्दों सा जीता है ‘वीर’, क्यों मर जाना चाहता है|

अक्सर

तहज़ीब निभाया करते हैं वो मुझसे अक्सर, आईना छुपा लिया करते हैं वो मुझसे अक्सर| सच के काँटों से मेरा ज़हन कहीं लहू न हो जाए, मेरा झूठ अपने होटों से लगा लिया करते हैं अक्सर| आईना छुपा लिया करते हैं वो मुझसे अक्सर… वो ना आये लौटकर एक अरसा गुज़र गया, हम शाम ढले

उसे फिर ज़िंदा मत कर

मुझसे मेरी मर्ज़ी पूछ कर, मुझे शरमिंदा मत कर, मेरा ‘मैं’ मर चूका है, उसे फिर जिंदा मत कर| तेरी ख्वाइशों पर जलना, मेरी मोहब्बत की इन्तहा है, मुझे परवाना रहने दे, आज़ाद परिंदा मत कर| मेरा ‘मैं’ मर चूका है, उसे फिर जिंदा मत कर…

जला हुआ सा

कुछ अन्दर दबा हुआ सा, कुछ हलक में फंसा हुआ सा| सिर्फ धुआँ है आँखों के आगे, खामोश दिल है बुझा हुआ सा| इतनी काली है ज़हन की दीवारें, ना जाने क्या कुछ जला हुआ सा|

आदत और ज़रुरत

आदत और ज़रुरत से कुर्बत का गुमान होता है, मगर इससे कहीं बढ़कर आदमी का ईमान होता है| घर वो है जिसमें दिलों के रिश्ते पलते हैं, चार दीवारों और एक छत का बस मकान होता है|

कोशिश

दीवार कोई दरमियान बनाने की कोशिश है, किसी और से पहले खुद को मनाने की कोशिश है| दूसरा खुदा मिल जायेगा तुम्हें फिर कोई ‘वीर’, अभी सिर्फ अपना ईमान बचाने की कोशिश है| वो अपनी चादर के किनारों से उलझे रहे ‘वीर’, उनकी हमें ख्वाबों से मिटाने की कोशिश है|

सर झुका है

दाग-दाग है दिल दर्द की निशानियों से, सर झुका है मेरा यार की नादानियों से| तुम ना पुछा करो मेरे दर्द का सबब, तेरा दिल उलझ जायेगा मेरी परेशानियों से| सर झुका है मेरा यार की नादानियों से.. कुछ अरसे में ये मौसम बीत जायेगा ‘वीर’, लगने लगेंगे ये मसले किस्से कहानियों से| सर झुका

तुम गहराई में जाओ अपने दर्द की

तुम गहराई में जाओ अपने दर्द की, बयां तो हो तबीयत तुम्हारे मर्ज़ की| जिंदगी नाम है खुद को हासिल करने का, कब तलक दोगे झूटी दुहाई फ़र्ज़ की| तुम गहराई में जाओ अपने दर्द की…