Tag: खलिश

मेरे गम मेरे ही रहेंगे

किससे क्या कहें, किससे क्या कहेंगे, मेरे गम मेरे ही रहेंगे| कांटे हैं ये ज़हन के बाग के, हम इन्हें मोतियों से पिरोइंगे| मेरे गम मेरे ही रहेंगे| हमदर्दी नहीं हैं चारा इनका, दोस्त हमें और क्या देंगे| मेरे गम मेरे ही रहेंगे| चलते जाना मजबूरी है या फितरत, सहा है, युहीं और सहेंगे| मेरे

एक मर्ज़

मेरे वजूद से जुदा एक क़र्ज़, ला-इलाज ला-इलाज, एक मर्ज़| कोई कहता इसे बंदगी, कोई कहता इसे फ़र्ज़, लाइलाज लाइलाज, एक मर्ज़| कहा ना जो कभी लबों ने, आज निगहों ने किया है अर्ज़| लाइलाज लाइलाज, एक मर्ज़| बदले उसने रिश्ते मौसम की तरह, बदली हमने तस्वीर ऐ खुदा, क्या हर्ज़| लाइलाज लाइलाज, एक मर्ज़|

रिश्तों में दूरियाँ

दोस्ती करके भुलाना नहीं जानता, रिश्तों में दूरियाँ बनाना नहीं जानता| कहता है वो, टूट गए सब मरासिम, नादान… झूट को सच का नकाब पहनना नहीं जानता| रिश्तों में दूरियाँ बनाना नहीं जानता….. मेरी कहानी, मेरी जुबानी, फ़साना हो गयी| शायद, वो इस नाम का कोई दीवाना नहीं जनता| रिश्तों में दूरियाँ बनाना नहीं जानता…..

बंद दरवाज़े

रस्मों की दीवारों पे जड़े बंद दरवाज़े, खयालों की भीड़ में, खड़े बंद दरवाज़े| ये जहाँ तुम्हारा, ये ईमान तुम्हारा, मेरे अरमानो को क्या क़ैद कर सकेंगे, तुम्हारी सोच के ये बंद दरवाज़े| ‘वीर’, एक दिन तेरी कहानी के गवाह बनेंगे, खयालों की भीड़ में खड़े ये बंद दरवाज़े|