मोहब्बत

अच्छा लगता है…

तुम से दिल की हर बात कहना अच्छा लगता है, इस बेगानी दुनिया में तू मुझे अपना लगता है| तुझ संग गुज़र रही है बहुत आराम से ज़िंदगी, तुझ बिन फूलों से भरा रास्ता खुदरा लगता है| तुम से दिल की हर बात कहना अच्छा लगता है… सादा दिल ही यहाँ होते हैं दाग-दाग, जिन्हें

चांदनी का डर्र

अँधेरी तन्हा रात कितनी उदास बेठी है, चांदनी डर्र से चाँद के पास बेठी है| है मेरे रकीब चारो तरफ महखाने में, वो जो एक महज़बीं मेरे पास बेठी है| चांदनी डर्र से चाँद के पास बेठी है… तेरा वजूद ही मेरी क़ज़ा का फरमान है, जाम के साए में छुपकर प्यास बेठी है| चांदनी

कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ

हर दिन अपने लिए एक जाल बुनता हूँ, कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हूँ| हर रोज़ इम्तिहान लेती है जिंदिगी, हर रोज़ मगर मैं मोहब्बत चुनता हूँ| कभी ज़हन, कभी दिल, कभी रूह की सुनता हू… बहुत दूर चला आया हूँ कारवाँ से, तन्हा रास्तों में एक हमसफ़र ढूंढता हूँ| कभी ज़हन,

तुम और मैं

राह-ए-उल्फत में अपना ठिकाना न आया, मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया| साज़-ए-जिंदिगी ने सुर ऐसा छेडा, मुझे गाना न आया, तुम्हें गुनगुनाना न आया| मुझे रूठना न आया, तुम्हें मनाना न आया… बच्चों की तरह गिले भी बड़े हो गए, मुझे भुलाना न आया, तुम्हें मिटाना न आया| मुझे रूठना न आया, तुम्हें

तेरी मामूली सी बातों में

तेरी मामूली सी बातों में, न-मामूली सा प्यार छुपा है | खामोश गहरी आँखों में, मीठा सा इकरार छुपा है | न तुमने कोई कसमें दी, न मैंने कोई अहद किया | मगर दोनों के दरमियाँ, अनकहा सा ऐतबार छुपा है | तेरी मामूली सी बातों में, न-मामूली सा प्यार छुपा है… दो जिंदिगियाँ वैसे

मोहब्बत कम से होती है

दुआ मांगते बहुत हैं पर इबादत चंद से होती है, इश्क बहुतों से हुआ पर मोहब्बत कम से होती है | तुम मेरी आवाज़ को यूँ नज़रंदाज़ मत किया करो, हर इंकलाब की आगाज़ ज़ुल्म ओ सितम से होती है | इश्क बहुतों से हुआ पर मोहब्बत कम से होती है… कभी मेरे इस ज़हन

गुज़रा

ये दिन भी कुछ अजीब गुज़रा, कभी तुमसे दूर कभी करीब गुज़रा| तेरे मेरे रास्ते यूँ टकराये अक्सर, तेरे हाथों से निकलकर मेरा नसीब गुज़रा| उसने भी सर झुका कर तसलीम किया, मेरे होसलों से मिलकर जब रकीब गुज़रा| वो पहले सी बात न थी किसी लम्हें में, तेरे बिन जो गुज़रा.. वक्त अजीब गुज़रा|

सीने से लगा

ये ज़रूरी नहीं की इकरार ए वफ़ा जुबानो तक जाए, सीने से लगा तो दिल की बात सीधे कानों तक जाए | दोस्ती, इश्क, मोहब्बत – कोई भी नाम दीजिये करम को, ये तो कोई बात नहीं की हर बात एहसानो तक जाए | सीने से लगा तो दिल की बात सीधे कानों तक जाए…

तुम्हें भी प्यार हो जाता

अगर तुम देख सकते खुद को मेरी निगाहों से, तुम्हें भी प्यार हो जाता खुद की अदाओं से | जब तुम्हारी ये मासूम ज़ुल्फें तुम्हें सताती हैं, तब मेरी उँगलियाँ मचलती हैं ख्याल-ए-खताओं से | तुम्हें भी प्यार हो जाता खुद की अदाओं से… तुम्हारा साथ मिला है इस दिल को जबसे, मुझे डर नहीं

तुम्हारी कशमकश ने मुझे

तुम्हारी कशमकश ने मुझे हैरत में डाला है, क्यों आईना साफ़ करते हो, जब अक्स ही काला है| हर तस्वीर के दो चेहरे होना लाज़मी है, एक जिसमें तारिकी है, एक जिसमें उजाला है| तुम्हारी कशमकश ने मुझे हैरत में डाला है… दरिया-ए-मोहब्बत में डूब जाना मुश्किल नहीं, तारीफ तो उसकी है जिसने, डूबे को