Tag: मोहब्बत

दिल को रोज़ नयी हसरतें होती हैं

काश की कहाँ हदें होती हैं, दिल को रोज़ नयी हसरतें होती हैं| कितना ही करीब हो हमनफस ‘वीर’, कुर्बत की और गुंजाइशें होती हैं| दिल को रोज़ नयी हसरतें होती हैं…

तेरे काजल सा

दर दर फिरा आवारा बदल सा, मिला ना कोई रंग तेरे काजल सा| तेरी सादगी के सजदे करता रहा, लेता रहा तेरा नाम किसी पागल सा| मिला न कोई रंग तेरे काजल सा..

बेखुदी से

तिनका-तिनका मर रहे हैं खुशी से, हमें क्या कुछ ना हासिल हुआ बेखुदी से| हम दीवार की दरारों से झांकते हैं उन्हें, दिखते हैं मेरे जनाब बिखरे-बिखरे से| हमें क्या कुछ ना हासिल हुआ बेखुदी से… कुर्बतों का कहर बरपा इस कद्र ‘वीर’, हाथ उठा मांग रहे हैं फासले सभी से| हमें क्या कुछ ना

बेगाना हुआ शम्मा से

बेगाना हुआ शम्मा से तो क्या जी पाऊँगा, और यूँ ही उस पर मरता रहा तो मर ही जाऊँगा| क़ज़ा आये तो आये जाम गुलाबी ले कर वीर, कोई तबिअत से पिलाये तो मैं ज़हर भी पी जाऊँगा| और यूँ ही उस पर मरता रहा तो मर ही जाऊँगा …

जब कभी तू मुझे बहूत याद आता है

मेरा अक्स मेरे साये में मिल जाता है, जब कभी तू मुझे बहुत याद आता है| इन्तहा है या सज़ा-ऐ-वफ़ा हमनफस, मुझे हर शय में तू नज़र आता है| जब कभी तू मुझे बहुत याद आता है… मैं ज़हर पीना तो छोड़ दूं दोस्त मेरे, मगर शाम तलक दिल भर जाता है| जब कभी तू

तुमसे बेहतर मुझे कौन

मेरी हर एक अदा को दिल से लगाया है, तुम से बेहतर मुझे कौन समझ पाया है| अश्क जो छुपा रखे थे मैंने, दर्द जो दबा रखे थे मैंने, उन सब से तुमने अपना दामन सजाया है| तुम से बेहतर मुझे कौन समझ पाया है…

जुबां आखिर जुबां है

मुमकिन है बात गलत, मुँह से निकल गई होगी, जुबां आखिर जुबां है, बेइरादा फिसल गई होगी| बंद तालों में कब तक, रखें अपनी हसरतों को, तमन्ना एक मासूम सी, दिल में मचल गई होगी| जुबां आखिर जुबां है, बेइरादा फिसल गई होगी… मेरे लफ्ज़ जानते हैं, तुम्हारी अहमियत को, उनकी दिल से ईमानदारी, भटक

फिर गुमान हुआ है

सदमा खुदसे बिछड़ जाने का, फिर गुमान हुआ है तुम्हें पाने का| हासिल मोहब्बत का हमने ये जाना, जिंदगी नाम नहीं है मुरझाने का| फिर गुमान हुआ है तुम्हें पाने का… मुश्किल है हर हसरत का जिस्म होना, आँखों से गिला कैसा, यूँ छलक जाने का| फिर गुमान हुआ है तुम्हें पाने का..

बेरुखी-ऐ-गुल

उसके प्यार का अंदाज़ समझिये. बेरुखी-ऐ-गुल का राज़ समझिये| उस गुल को खौफ है अपने काँटों का, उसकी ख़ामोशी की आवाज़ समझिये| बेरुखी-ऐ-गुल का राज़ समझिये… जिंदगी जीने का सदा सा फलसफा है, कल से मुख्तलिफ अपना आज समझिये| बेरुखी-ऐ-गुल का राज़ समझिये… मेरे होने तक एक पहेली ही रहेगी, मेरी जीस्त का मसला मेरे