परछाइयाँ

चंद लम्हों को

चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं, बनाने वाले गमों को भी, खुशियाँ बना लेते हैं| न पंख बचे और अब न होसला उड़ने का, शाम होते ही, हम कागज़ पर तितलियाँ बना लेते हैं| चंद लम्हों को कई सदियाँ बना लेते हैं… घुटने टेक दिए हैं हर हसरत ने आते-जाते, अपने अंदर के

मेरी इस ज़िद ने

मेरी इस ज़िद ने कितने रिश्ते मिटा दिए, अहम की आग ने  कई साथ जला दिए| कहीं मेरी तलाश गुमराह न कर दे उसे, मैंने ये सोच कर अपने अरमान बुझा दिए| मेरी इस ज़िद ने कितने रिश्ते मिटा दिए… वो जब चाहे लौट कर आ सके मुझ तक, मैंने उसकी हर मंजिल पर रास्ते बिछा दिए|

ज़रूरी

वक्त के हाथों बिक गए हैं कई इंकलाब ज़रूरी, बहते हैं अश्क से के सहरा में है आब ज़रूरी | अपनी दोहरी शक्सियत से पशेमां क्यों रहूँ, आबाद को समझने के लिए है खराब ज़रूरी | वक्त के हाथों बिक गए हैं कई इंकलाब ज़रूरी… कहो ज़ोर से मगर हलक से चीख न निकले, सच

तेरे सिवा अब कोई नहीं

चल उठ के देर हो गयी है घर जाने में, तेरे सिवा अब कोई नहीं, इस मयखाने में | एक लम्हा था जो कमज़ोर कर गया मुझे, वरना एक उम्र छोटी थी, उसको भुलाने में | तेरे सिवा अब कोई नहीं, इस मयखाने में … ये खेल है तेरी उलझी ज़ुल्फों का हमनफस, के बात बिगड़ती चली

अपने मुकद्दर का खुदा हूँ मैं

एक बार फिर टूट के जुड़ा हूँ मैं, अपने मुकद्दर का खुदा हूँ मैं| हर बार सँभलने की मेरी आदत है, मुश्किलों से कब झुका हूँ मैं| अपने मुकद्दर का खुदा हूँ मैं…

धड़क रहा हूँ

मैं बदल गया हूँ, मैं बदल रहा हूँ, सबकी निगाहों को क्यों, मैं खटक रहा हूँ| मुझ में क्या था, जो अब नहीं है| मुझ में क्या है, जो पहले नहीं था| मैं तब भी धड़क रहा था, मैं अब भी धड़क रहा हूँ|

किसी और का था

जिसे देखते थे आईने में, वो अक्स किसी और का था| मुझ सा दिखता तो था मगर, वो शख्स किसी और का था| मेरे पाँव थिरकते रहे, बदलते हालातों के सुर में| मैं वहाँ मौजूद तो था मगर, वो रक्स किसी और का था| हम तो अनजान थे, के रास्ते ले जाएंगे कहाँ| हम सिर्फ

उसकी हम पर नज़र नहीं है

अब बातों में असर नहीं है, उसकी हम पर नज़र नहीं है| हौसले ना-उम्मीद हो गए मगर, कोशिशों में कोई कसर नहीं है| उसकी हम पर नज़र नहीं है… मंजिलें हुई धुँधली गर्द से, और तेरा कोई हमसफ़र नहीं है| उसकी हम पर नज़र नहीं है… चल कहीं दूर चलें ‘वीर’, इस जहाँ में तेरी

मैं थोड़ा कच्चा ही हूँ हिसाब में

क्या लिखें क्या ना लिखें इस किताब में, मैं थोड़ा कच्चा ही हूँ हिसाब में| बयां कैसे करूं इतने रंगों को, इतने रंग दिखते हैं मुझे जनाब में| मैं थोड़ा कच्चा ही हूँ हिसाब में… ख्वाब में ही सही पर एक फूल तो है, सबकुछ बंजर नहीं दिल-ऐ-बर्बाद में| मैं थोड़ा कच्चा ही हूँ हिसाब

किस मसीहा को बचाया जाए

काहिये आज किस मसले को सुलझाया जाए, किस कातिल को सज़ा दें, किस मसीहा को बचाया जाए| रात भर थक कर सोया है महताब सहर को, दिन के उजालों में उसे ना जगाया जाए| कहिये आज किस मसले को सुलझाया जाए… हमारे हबीबों में यूँ तो दानाई बहुत हैं, बात करें उनसे दिल की या