Tag: परछाइयाँ

असां नहीं था

रूठी जिंदिगी को मनाना असां नहीं था, टूटे सपनों को सजाना असां नहीं था| राह भी मुश्किल थी और मंजिल धुंधली, लड़खड़ाते हुए चलते जाना असां नहीं था, टूटे सपनों को सजाना असां नहीं था… चुभते काँटों से थे मेरे ख्वाब अधूरे, होसलों के फूल खिलाना असां नहीं था| टूटे सपनों को सजाना असां नहीं

बस एक पल और

बस एक पल और फिर कुछ नहीं है, वैसे यह ख्याल उतना भी बुरा नहीं है| सब मशरूफ रहेंगे अपने बवाल में, बस भीड़ में एक शख्स अब नहीं है| वैसे यह ख्याल उतना भी बुरा नहीं है… कह दो मेरी बंदगी परखने वालों से, जो उनका खुदा है वो मेरा नहीं है| वैसे यह

मंजिलों से रास्ता लेकर

हम भागते रहे मंजिलों से रास्ता लेकर, वो जुड़ते रहे दिलों में फासला लेकर| तोड़ कर हमने फिर पहनली जंजीरें, वो फिर आ गए वही वास्ता लेकर| हम भागते रहे मंजिलों से रास्ता लेकर… इन आँखों को अब रंग नहीं दिखते, बस जमी है एक तस्वीर माजरा लेकर| हम भागते रहे मंजिलों से रास्ता लेकर…

दुआ में असर रहे

कभी तो दुआ में असर रहे, कभी तो उसकी हम पर नज़र रहे| मैं तोड़ दूंगा सारी बंदिशें सनम, तुझमें साथ चलने का जिगर रहे| कभी तो दुआ में असर रहे… बेखुदी उलझा ले चाहे जितना, तुम्हे जिंदिगी की तो कदर रहे| कभी तो दुआ में असर रहे… पत्थर पर्वत नदी हो या तूफ़ान, बस

सौदा

बस कीमत का फर्क है, यहाँ सब बिकता है| यह सौदा ठीक लगता है… उनको झूठा अदब देकर, उनसे झूटी इज्ज़त लेकर, इतना अकडकर चलता है| यह सौदा ठीक लगता है… हर दिन की कश्मकश, हर रात का काला सच, लम्हा लम्हा मरता है| यह सौदा ठीक लगता है… अकेला घिरा भीड़ में, तन्हा फिरा

नादां

ऐसे नादां की हर ठोकर पर गिरते हैं, फिर भी हम दाना बने फिरते हैं| कौन मरता है किसी के साथ यहाँ, कैसे हमदम जाना बने फिरते हैं| फिर भी हम दाना बने फिरते हैं… कहने को एक घर है पास लेकिन, कितने साये वीराना बने फिरते हैं| फिर भी हम दाना बने फिरते हैं…

गम हमारे खुशी अपनी

क्यों लिखते हैं बेखुदी अपनी, हैं गम हमारे खुशी अपनी| आईने से नाराज़ हैं हम, है खुदसे बेरुखी अपनी| कोई पूछे मंजिल तो क्या कहें, आवारा कर गयी बेसुधी अपनी| कौन हैं हालात का जवाबदार, हैं हम और है बेबसी अपनी| मिलो सबसे मुस्कुराकर ‘वीर’, ज़माना देख ले जिंदादिली अपनी|

सहम जाता है

उसूल दरवाज़ा खटखटाते हैं तो जज़्बात सहम जाता है, दिल बच्चा सा है हमारा थोड़ी आहट से सहम जाता है| सही और गलत के दायरों में ढलते-ढलते, मासूम एक नन्हा सा दिल मचल जाता है| झूट और सच का आईना बड़ा कमज़ोर होता है, हसरत के एक छोटे से पत्थर से ये चटक जाता है|

आईने में

फिर सर झुकाये दिखे हम आईने में, फिर खुदको छुपाये दिखे हम आईने में| जो अक्स धुंधला दिया वक्त ने, उससे फिर घबराये दिखे हम आईने में|

पछतायेगा

मुझको खुदा मत बना पछतायेगा! मैं बंदगी नहीं इखलास का प्यासा हूँ, मुझको इबादत मत बना पछतायेगा| है मुझ में दर्द कई, मैं भी नाराज़ हूँ खुदसे, मुझको फरिश्ता मत बना पछतायेगा| मैं हासिल से दूर ही भला, खाली हाथ जाऊँगा| मुझको सिकंदर मत बना पछतायेगा|