Tag: परछाइयाँ

शिकवा जिंदिगी से

अब ना कोई शिकवा है जिंदिगी से, ज़हर पी लिया हमने अपनी खुशी से| भटकते ख्यालों का जशन ना हो खत्म, कुछ सिलसिले बना रखे हैं सभी से| अब ना कोई शिकवा है जिंदिगी से… ढूँढता है वो मुझे गलियों गलियों, जब हम मिट चुके हैं कभी के| अब ना कोई शिकवा है जिंदिगी से…

तलाश

दीवारों में कुछ छेद थे… इन्हें आज भर दिया| अब इंतज़ार इनसे लिपट तो सकता है, मगर ख्यालों तक नहीं पहुंचेगा| दर्द चुनवा दिए हैं…यह अब ज़हन में क़ैद रहेगा| किसी चरागाह की तलाश नहीं है| अब इसे भी घुटन नहीं होती| मायने जिंदिगी के मुझे नहीं सताते… बेमतलब ही सही वजूद| अब अपनी खुदी

घर को जाता हूँ

घर को जाता हूँ… बहुत कुछ बिखरा है वहाँ, टुकड़े हैं मेरे कुछ फर्श पर| दीवारों पर धबे हैं मेरे झूट के| फीका पड़ गया हैं इनका रंग… इन्हें धोना है | घर को जाता हूँ… मेरी तस्वीरों पे गर्द है| किताबें उसूलों की डेस्क में बंद है| सपने सीलिंग पे लटके लटके थक गए

आग

दूर खड़ा वो आग को देखता है… आग की गर्मी महसूस होती है| उसे हमेशा कशिश थी आग जैसा होने की.. शायद उसे अपना कोई हिस्सा वहाँ बुलाता है| दूर खड़ा वो आग को देखता है… बढते हैं कदम तो पसीने से, जैसे उसने बाकी अपने हिस्से पिघला दिए है| जितना करीब वो जाता उतनी

तबियत से लिखा किरदार

क्यों इतना समझदार है वो, बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो| कौन है किस भेस में बता खुदी, क्या मेरा कोई हिस्सा बीमार है वो| बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो… मैं ना बुन पाया फासले दरमियाँ, सोहबत से बड़ा खुशगवार है वो| बड़ी तबियत से लिखा किरदार है वो… मैं कि रोज़गार

फीकी बात

गहरी बात, तीखी बात, करते हो तुम फीकी बात| क्या इनमे कुछ है तुम्हारा, या बोल रहे हो सीखी बात| करते हो तुम फीकी बात.. मोड़ दिए फिर बेजान लफ्ज़, करते क्यों नहीं सीधी बात| करते हो तुम फीकी बात.. रूखे मुंह से बोली तुमने, जज्बातों में सीती बात| करते हो तुम फीकी बात.. तडपते

स्याही के धब्बे

स्याही के कुछ धब्बे सा हूँ मैं.. तुम इनमे मतलब ना ढूंढो, कोई छिडक गया था बेइरादा इन्हें| बस उलझे लफ़्ज़ों का भवर है, जिनमे डूबती है कुछ कागज की कश्तियाँ| संभालो, तुम्हारी उँगलियों से भवर ना टूट जाए.. इनमे घुटना ही मेरी इन्तेहा है| स्याही के कुछ धब्बे सा हूँ मैं..

नज़र का फेर है प्यारे

सपनों का ढेर है प्यारे, बस नज़र का फेर है प्यारे| तू ही डर, तू ही हिम्मत, तू ही ताकत, गीदड़ में छुपा शेर है प्यारे| बस नज़र का फेर है प्यारे… तु ही मुसाफ़िर, तू ही कारवां, तू ही मंजिल, फिर किस बात की देर है प्यारे| बस नज़र का फेर है प्यारे… कौन

मैं खुद को ढूँढ रहा हूँ

तिनका तिनका समेट रहा हूँ, मैं खुद को ढूँढ रहा हूँ| क्या छुपा है ज़हन में, मैं खुद से पूछ रहा हूँ| क्या मरासिम है जिंदिगी से, मैं मायने ढूँढ रहा हूँ| खोखली लगती है सारी दुनिया, मैं क्या ढूँढ रहा हूँ| इतने साये हैं मुझसे लिपटे, अपना साया ढूँढ रहा हूँ| खामोश अंधेरा तन्हा

वो आवारा

मंज़िलें तडपती रहीं, रास्ते मचलते रहे| वक्त पलट के देखता रहा, उस अवारे को .. उसकी शायद मंजिल ही तलाश थी.. रुसवा कर चुका था वो जज़्बात को… देखता था वो धुंद में तस्वीर कोई… उसकी फितरत ही थी रास्तों को नापने की… ख्यालों की दुनिया उसकी अपनी थी… उसे सदाओं का आसरा ना था..