तलाश

बहते बहते

कह दे के देर ना हो जाए कहते-कहते, ये किनारा भी न छूट जाए बहते-बहते| फिर ज़ख्म खाने की आदत हो जाएगी, गर यूँ ही खामोश रहा तू सहते-सहते| ये किनारा भी न छूट जाए बहते-बहते… हुनर नहीं बस नवाज़ा है खुदा ने, लिखता हूँ ख्याल अपने यूँ ही बैठे-बैठे| ये किनारा भी न छूट

अंगार ढूँढता हूँ

कैसा कर्ज़दार हूँ के सूद लिए साहूकार ढूँढता हूँ, जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अंगार ढूँढता हूँ| न शहर बचा, न घर.. और न घर में रहने वाले, तन्हाई की धुप में सर छुपाने को दीवार ढूँढता हूँ| जल रहा हूँ अंदर और पैरों के नीचे अंगार ढूढता हूँ… एक मुद्दत गुज़र गयी

ख्यालों के हुजूम से

ख्यालों के हुजूम से, तनहाइयों के गलियारों तक, अपना सच ढूँढ रहा हूँ, मैं सोच के किनारों तक| खुदा भी मिला है और काफ़िर भी मुझे, मैं सिमट के रह गया हूँ, अपनी चार दीवारों तक| अपना सच ढूँढ रहा हूँ, मैं सोच के किनारों तक… मेरी आँखें गोया उसकी गुलामी करती हैं, वो ही

कौन है वो

सजा ले मेरे नुस्क अपने दामन में, मिटा दे मेरी आवारगी को, कौन है वो… लम्हा लम्हा जो बिछड़ा मुझसे, छीन ले जो उसे वक्त से, कौन है वो… ‘वीर’, इस शोर में सुन ना पाऊँगा उसे, फिर भी आवाज़ दे जो, कौन है वो…