तन्हाई

आमद

खैर इस बार उसका होना अजीब न था.. हाँ अजीब था उसका बेवक्त आना| सहर से सतह पर कोई नमी के निशां नहीं थे| और सुबह से बच्चों की किलकारियां कानों में शहद घोल रही थी| एक खूबसूरत दिन अंगड़ाई लेकर बिस्तर से उठा था| दोपहर की भाग-दौड ने फुर्सत को बैठने का मौका ही नहीं

बगावत कर दी है

इतने सिरों का छोर, पकड़ा है, एक अकेली जान से, बगावत कर दी है ज़हन ने, दिल-ए-परेशान से | डूबने लगता है, इसकी दस्तक से घबरा के दिल, तन्हा रात का खौफ, सताने लगता है शाम से | फिर भी हम, नहीं करते कभी सच कबूल, के अपने ही घर में जीये जा रहे हैं,

कुछ तो कहीं हुआ है

कुछ तो ठीक नहीं है ऐसा मुझे पता है, कुछ तो कहीं हुआ है ऐसा मुझे लगा है| ज़हन का करार लूटा है अचानक बेचैनी ने, जैसे ठहरे हुए पानी में कोई कंकड़ गिरा है| कुछ तो कहीं हुआ है ऐसा मुझे लगा है… इसे एक काफिर का खौफ ही समझिए ‘वीर’, आज एक बुत के सामने मेरा सर झुका है| कुछ तो कहीं हुआ है ऐसा मुझे लगा है…  

मेरा सुखन

मेरी उदासी मेरी गहराईयों का नतीजा है, मेरा सुखन मेरी तन्हाईयों का नतीजा है| इतना ज़हर कैसे भर गया मेरे दिल में, मेरी कड़वडाहट तुम्हारी नादानियों का नतीजा है| मेरा सुखन मेरी तन्हाईयों का नतीजा है… मैं ढूंढता रहा एक साया अंधेरों में, मेरा हश्र मेरी रवानियों का नतीजा है| मेरा सुखन मेरी तन्हाईयों का

शहर

भागता शहर, भटकता शहर, इतनी नसों में धड़कता शहर| हर कदम पर कोई कदम साथ है, मगर हर कदम पर लड़कता शहर| जिंदगी वहीं की वहीं थमी हुई है, जाने किस तलाश में भटकता शहर| अपने घर तो सबसे छूट गए, मेरी इन आँखों को खटकता शहर|

हम खुद के साथ खेले बहुत हैं

सवालों और जवाबों के घेरे बहुत हैं, हम खुद के साथ खेले बहुत हैं| हमें किसी महफिल की आरजू नहीं, हमारे दश्त-ऐ-तन्हाई में मेले बहुत हैं| हम खुद के साथ खेले बहुत हैं… बुरा क्या गर वहमों में गुज़रे जिंदगी, सच कहने और सुनने के झमेले बहुत हैं| हम खुद के साथ खेले बहुत हैं…

तो बेहतर होता

मुंह हमसे मोड़ लेते तो बेहतर होता, ये दिल तोड़ ही देते तो बेहतर होता| बेगानी सी लगती है अब तन्हाई भी, वक़्त रहते हमें छोड देते तो बेहतर होता| ये दिल तोड़ ही देते तो बेहतर होता… खबर थी हमें मंजिलों की साज़िश की, रास्तों को हम मोड़ देते तो बेहतर होता| ये दिल

काफिर की दुआ

किसी काफिर की दुआ हूँ मैं, धुएं सा बुझ चला हूँ मैं| मेरा नाम पुकारता नहीं कोई, ख़ामोशी की सदा हूँ मैं| धुएं सा बुझ चला हूँ मैं… रख मुझसे दूरी ही तू, बेखुदी की बला हूँ मैं| धुएं सा बुझ चला हूँ मैं… दिन में पिघलता आसमान, हर शाम तुझ में ढला हूँ मैं|

नींद का सौदा

रात घूरता हर तारा है मुझे, नींद का हर सौदा गवारा है मुझे| जागते जागते आंखें थक गई, किस मर्ज़ ने मारा है मुझे| नींद का हर सौदा गवारा है मुझे… इस खेल का वो पुराना खिलाडी है, उसने हर शर्त पे हारा है मुझे| नींद का हर सौदा गवारा है मुझे… मैं तो ढलता

आवारगी हमें कहाँ ले आई

ढूँढ रहे थे हम किसे वीरानो में, आवारगी हमें कहाँ ले आई| है कोई वाकया इन सिलसिलों में, फितरतें हमें कहाँ ले आई| तपता सूरज आंख में चुभता रहा, रात के सन्नाटों ने ख़ामोशी चुराई| झुझते रहे हम करवटों से रात भर, हर सिलवट ने आवाज़ हमें लगाई| मत पूछ के कैसे लिखता है ‘वीर’,