Tag: तन्हाई

हर कदम पे एक रिश्ता

हर कदम पर एक रिश्ता बिछड़ गया मुझसे| तेरी कोई खता नहीं, कोई गिला नहीं तुझसे| इस बगिया को सजाया मैंने ही नहीं, जुदा ना हुई कभी आवारगी मुझसे| कोई तेरा नहीं इस दुनिया में ‘वीर’, इस ख्याल को ज़ब्त किसने किया तुझसे|

रोता क्यों नहीं

तडपता है तो रोता क्यों नहीं, रात है ज़ालिम तू सोता क्यों नहीं| है अगर जिंदिगी कोई क़र्ज़ तुझपे, फिर खामोश ढोता क्यों नहीं| तडपता है तो रोता क्यों नहीं … गर नहीं इक्तेहार में कुछ तेरे, कर लेता समझोता क्यों नहीं| तडपता है तो रोता क्यों नहीं … अतीत को किया तो है तालाबंद,

आईने से

बे लिबास है अकेलापन, क्या देखते हो आईने से| कोई राज़ नहीं है दफ़न, क्या सोचते हो आईने से| खामोश सदा की गूंज है, क्या बोलते हो आईने से| मिट रहा हूँ कतरा कतरा, क्या रोकते हो आईने से| फितरत है कहने दो ‘वीर’ को, क्या टोकते हो आईने से|

हम ढूँढ़ते हैं

कहाँ चले गए वो कारवां लेकर, हम रेत पे पैरों की निशां ढूँढ़ते हैं| सब मशरूफ़ हैं अपनी तलाश में, हम एक हमदर्द इंसा ढूँढ़ते हैं| मिलते हैं कितनों से हर दिन, खुद से मिलने का समां ढूँढ़ते हैं| है सुकून तेरे ज़हन में ही, हम इसे कहाँ कहाँ ढूँढ़ते हैं| मजबूरी है या हौसला

कमरे की दीवारें

कमरे की दीवारें क्यों घूरती लगती हैं, पंखे की आवाजें क्यों डूबती लगती हैं| दिन भर की थकान से मुरझाया हर गुल है, ख्यालों की तितलियाँ क्यों उडती लगती हैं| कमरे की दीवारें क्यों घूरती लगती हैं….. नींद कोई ख्वाब है जिसे आँखों ने चुरा लिया, पलकें बंद मगर हर तरफ रौशनी क्यों लगती हैं|

कल कर लूँगा

अपनी बात पर यकीं, कल कर लूँगा, इस ख्याल को ज़मी, कल कर लूँगा| तन्हाई में जलता है हर लम्हा, उसकी यादों को हसीं, कल कर लूँगा| कितने रिश्ते भुला दिए इश्क में, अपनों को अज़ीज़, कल कर लूँगा| मुस्कुरा कर मिलते हैं जो आज भी, उनकी दोस्ती को तस्लीम, कल कर लूँगा| वो भी

तन्हा जाम

एक हम ही नहीं अकेले, तेरे मयखाने में साकी, महफ़िल में आज, कुछ तन्हा जाम भी थे| मंजिल पर खड़े सोच रहा हूँ, सफ़र में, कुछ इससे हंसीं मकाम भी थे| महफ़िल में आज, कुछ तन्हा जाम भी थे… मेरे जूनून को समझ कौन पाता, यारों में कुछ संगदिल, तो कुछ अक्ल के गुलाम भी थे|