यादें

ये तुम हो के मुझे वहम हुआ है

ये तुम हो के मुझे वहम हुआ है, ये बस लफ्ज़ हैं या फिर तेरी दुआ है | मालूम होता है सर पर हाथ पहचाना सा, क्या फिर तुमने मेरी तस्वीर को छुआ है | ये तुम हो के मुझे वहम हुआ है… ख्वाब को कह दो बेवक्त आया न करें, अभी मैं मायूस हूँ

कोशिश करते हैं

यादों के धागे सीने की कोशिश करते हैं, हम उन लम्हों को फिर जीने की कोशिश करते हैं| ओस से हलकी थी उन अश्कों की बूंदें, हम जाम-ए-बेखुदी फिर पीने की कोशिश करते हैं| तुम्हारे बिना जिंदगी नहीं है जिंदगी, हम हर दिन फिर भी जीने की कोशिश करते हैं| बिछड़ा हुआ है अपने साहिल

उनकी गली में जाना हुआ

बाद मुद्दत उनकी गली में जाना हुआ, अजनबी हो गया हर शख्स पहचाना हुआ| वो खिड़की अब हमेशा बंद रहती है, वो शख्स इस शहर से बेगाना हुआ| बाद मुद्दत उनकी गली में जाना हुआ… भूल भी जा उन यादों को अब ‘वीर’, उनको तुझसे बिछड़े एक ज़माना हुआ| बाद मुद्दत उनकी गली में जाना

कहानी ना ढूंढ

हर शय में कोई निशानी ना ढूंढ, हर इत्तफाक में कोई कहानी ना ढूंढ| दिल की बात कहने आई थी सबा, अब इसमें सुबह सुहानी ना ढूंढ| हर इत्तफाक में कोई कहानी ना ढूंढ…

मैं जिधर गया

बहुत खूबसूरत था जो गुज़र गया, बस मलाल है के क्यों गुज़र गया| वो मैं ही था और वो तुम ही थे, जो दरमियान था जाने किधर गया| मुझसे साए सी जुडी है वो तसवीरें, नज़र आती रहीं मैं जिधर गया| इस ख्वाब की फितरत अजब थी ‘वीर’, जो तामीर हुआ तो बिखर गया|

थोड़ी दूर साथ चला था

कोई पहचाना सा चेहरा, हमें भीड़ में दिखा था| कोई मरासिम नहीं था, बस थोड़ी दूर साथ चला था| दूर वफ़ा के साहिल थे, उसके हम कहाँ काबिल थे| ना उम्मीद थी ना गिला था, बस थोड़ी दूर साथ चला था| हमने कुछ कहा भी नहीं, उसने कुछ पुछा भी नहीं| शायद वो सब जानता

यादों में अब भी वो शहर बसा है

उससे बिछड़ने का मुझे गिला है, यादों में अब भी वो शहर बसा है| उस गली के किस्से अबतक महकते हैं, मेरा कुछ अब भी उस गली में  पड़ा है| यादों में अब भी वो शहर बसा है… लौट के जाना मुमकिन हो भी सही, लेकिन मेरा कौन अब वहां बचा है| यादों में अब

लम्हें जो याद रहें

लम्हें जो याद रहें देता जा मुझे, या फिर अपने साथ लेता जा मुझे| कहीं भूल ना जाओं तेरे अहसास को, आ उम्र भर का गम देता जा मुझे| लम्हें जो याद रहें देता जा मुझे… दोहराता रहूँ हर दिन मैं जिसको, ऐसा कोई एक मंज़र देता जा मुझे| लम्हें जो याद रहें देता जा

सूखे अश्कों के दाग

कल रात यादों से हम इतने आबाद थे, सुबह तकिये पर सूखे अश्कों के दाग थे| चादर से ढांक रखी थी हमने हकीकत, और खुली आँखों के ख्वाब आज़ाद थे| सुबह तकिये पर सूखे अश्कों के दाग थे… बस तुम ही समाये थे हर लम्हे में, तुम ही ख़ामोशी और तुम ही आवाज़ थे| सुबह

तारीफ़ ए ग़ज़ल

लफ़्ज़ों के नक़ाब से गम छुपा लिया करते हैं, तारीफ़ ए ग़ज़ल पर हम मुस्कुरा लिया करते हैं| जब ख़ामोशी खटखटाती है तन्हाई का दरवाज़ा, अपनी ग़ज़लों को हम गुनगुना लिया करते हैं| तारीफ़ ए ग़ज़ल पर हम मुस्कुरा लिया करते हैं… कभी दिल मचल के कहने लगता है हाल अपना, तब एक साँस में