जिंदगी

दरिया दिया और प्यासे रहे

दरिया दिया और प्यासे रहे, उम्र भर साथ अपने दिलासे रहे। जो थे वैसा रहने न दिया, न सोना बने, न कांसे रहे। कब टिकती है अपने कहे पर, ज़ुबां ए जीस्त पर झांसे रहे। मुद्दतों कायम रहा अपना डेरा, हम जहाँ भी रहे, अच्छे खासे रहे। मुझमें क्या कुछ न बदला ‘वीर’, मगर ग़ैरों

खाली हाथों में

खाली हाथों में सिर्फ लकीरें न देख, मेरा होसला भी देख, सिर्फ तकदीरें न देख| कुछ कर गुज़रने के तलब खत्म नहीं हुई, मेरे अंदर की आग देख, पैरों की जंजीरें न देख| खाली हाथों में सिर्फ लकीरें न देख… चला आता है मुझ तक मुश्किलों का काफिला, मेरे उसूलों की ज़मीन देख, ज़माने की

कोई धार तो मुझे बहा ले!

कोई धार तो मुझे बहा ले, कब तक बैठूं नदी किनारे| ऊब गया हूँ देख-देख कर, बहता पानी, रुके किनारे| विचारों का प्रवाह निरंतर, मैं की खोज में भटकता अंतर| या इस कंकड़ को जल बना ले, या इस कंकड़ को तल बना ले| कोई धार तो मुझे बहा ले, कब तक बैठूं नदी किनारे…

आँखें खोल कर देख!

ज़हन से ख्याल झाड़ कर देख, डर्र की आँख में झाँक कर देख| जिंदिगी से खुद को मांग कर देख, अपने वजूद को पहचान कर देख| लम्हे को कभी बाँध कर देख, वक़्त के दरिये को थाम कर देख| हदों की सरहद को लांघ कर देख, हिम्मत को सर पर बाँध कर देख| खुद को

जिसकी इजाज़त दिल न दे

जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये, इन हाथों से अपना खेल तमाम मत कीजिये| बेसबब नहीं होता.. कुछ भी यहाँ, खुद से गद्दारी का ये काम मत कीजिये| जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये| डर्र हो या मोहब्बत हो किसी से, अपनी शक्सियत को दुसरे का गुलाम मत कीजिये|

जिंदिगी रूठी हुई

है लम्हें का अरमान मुझसे लिपट जाने का, देख रही है उसे हसरत से.. जिंदिगी रूठी हुई| मैं अपने ख़वाब जग ज़ाहिर नहीं करता, ये सलतनत है मेरी सभी से लूटी हुई| देख रही है उसे हसरत से जिंदिगी रूठी हुई.. उसने संभाल कर अलमारी में दफना दिया, वो जो एक चूड़ी थी उस दिन

हर शक्स के हाथ में कटोरा है!

हर शक्स के हाथ में कटोरा है, जिसके पास जितना है.. थोड़ा है| सांस – सांस मुजरिम बनी है, मेरी हर सांस ने मुझे तोड़ा है| हर शक्स के हाथ में कटोरा है… हसरत ए ख़ुशी में भागता है वहशी, आदमी.. आदमी कहाँ है? घोड़ा है! हर शक्स के हाथ में कटोरा है… मुझसे मांग

मुश्किल वक्त

जर्जर हौसला मरम्मत मांगता है, मुश्किल वक्त हिम्मत मांगता है| उम्र भर नेकी न की गयी मगर, अब बुढ़ापे में जन्नत मांगता है| मुश्किल वक्त हिम्मत मांगता… वफ़ा के सौदे में वो सितमगर मुझसे, शर्त में बेशर्त मोहब्बत मांगता है| मुश्किल वक्त हिम्मत मांगता… काफ़िर बेटों का वो खुदा-परस्त बाप, औलादों के लिए मन्नत मांगता

नहीं देखी जाती

तुम्हारी आँखों में हमसे वहशत नहीं देखी जाती, अपने हों या गैर हमसे नफरत नहीं देखी जाती| वो मेरी वफ़ा का रोज़ इम्तिहान क्यों लेता है? क्या उससे मेरी बेशर्त मोहब्बत नहीं देखी जाती? अपने हों या गैर हमसे नफरत नहीं देखी जाती… पलक-पलक हर आँख में क्यों चुभता है भला, इस ज़माने से हमारी कुर्बत

ताकत बहुत चाहिए

खामोश रहने के लिए, ताकत बहुत चाहिए, ज़ुल्म सहने के लिए, आदत बहुत चाहिए| यूँ तो मुझे भी हासिल है अदा रूठने की, रूठे रहने के लिए, अदावत बहुत चाहिए| ज़ुल्म सहने के लिए, आदत बहुत चाहिए… उम्र भर हम तुझे दुआओं में मांगते रहे, मगर असर के लिए, इबादत बहुत चाहिए| ज़ुल्म सहने के