Tag: जिंदगी

जिंदिगी को चख कर देखा

जिंदिगी को चख कर देखा तो बेस्वाद लगी, गुज़रे सब सालों की फसल बरबाद लगी| एक-एक करके सारा वक्त लूट लिया सबने, रिश्तों की ज़िम्मेदारियाँ लालची दामाद लगी| जिंदिगी को चख कर देखा तो बेस्वाद लगी… शहर की रोशन सड़कों में तन्हाई का बसेरा है, हमें मोहल्लों की स्याह गलियां आबाद लगी| जिंदिगी को चख

पसंद

सच, क्या तुझे भी सच सुनना पसंद है ? मैं झूठ हूँ, मुझे सच बुनना पसंद है | गाँठ जीस्त की खोल रहा है गुज़रता वक्त, मैं लम्हा हूँ, मुझे उलझना पसंद है | उम्मीद की डोर से पिरोई है आरजू मगर, मैं हसरत हूँ, मुझे बिखरना पसंद है | मेरे बाद तुझे तलब न

वक्त से पहले

वक्त से पहले ही मिल गयी मंजिल मुझे, और फिर न हुआ ताउम्र कुछ हासिल मुझे | मैं पूरा समंदर पी गया था लड़कपन में, फिर कभी दोस्त सा न मिला साहिल मुझे | और फिर न हुआ ताउम्र कुछ हासिल मुझे… और कोई नहीं बस एक ही खता हुई तुझसे, क्यों दे दिया तुने

क्या बतायें के हाल कैसा है

क्या बतायें के हाल कैसा है, मुझे खुद से ये मलाल कैसा है| अब भी गुज़रे वक्त में जी रहा हूँ, कल क्या होगा? ये सवाल कैसा है! क्या बतायें के हाल कैसा है… जकड़े रहती है दिन भर बाँहों में, मतलबी दुनिया का बवाल कैसा है| क्या बतायें के हाल कैसा है… एक गाँठ

मौला

अब की बार न हो मेरा ये हाल मौला, गुज़रे कुछ आराम से ये साल मौला | मैं खुद को बस पा जाऊं इस बरस, टूट जाए रिश्तों का ये जाल मौला | गुज़रे कुछ आराम से ये साल मौला… बहुत तन्हा हूँ तेरी इस दुनिया में, मुझे इस भंवर से निकाल मौला | गुज़रे

मैं हुंकार लेकर

जितना पीछे खींचकर रोकोगे मुझे, उतना आगे बढूंगा मैं हुंकार लेकर | उठा हूँ एक ज़र्रे से आंधी बनकर, मैं अपने आगोश में गुबार लेकर | उतना आगे बढूंगा मैं हुंकार लेकर… ये क्या शोलों से डराते हो मुझे, मैं चलता हूँ हाथों में अंगार लेकर | उतना आगे बढूंगा मैं हुंकार लेकर… इस जूनून

जिंदिगी की सौगात

जिंदिगी की सौगात को गम में ज़ाया न किजीये, अफताब सा रहे जीवन, इसे साया न किजीये| तुम जैसे भी हो वैसे ही मंज़ूर हो मुझे, खुदको मेरे मुताबिक बनाया न किजीये| जिंदिगी की सौगात को गम में ज़ाया न किजीये… अपने तजुर्बों से ही मुकम्मल होता है इंसान, माज़ी के पन्नों से हादसे मिटाया न

एक सौदा अपनी पूरी कीमत का

मुझसे एक सौदा अपनी पूरी कीमत का कर ले जिंदिगी, मुझे यूँ बार-बार किश्तों में जीना मंज़ूर नहीं| तेरी अपनी रवायत है और तेरी अपनी ही फितरत, तुझे हर हाल में कबूल करूँ, मैं इतना मजबूर नहीं| तू बदलती है क्यों मेरा रास्ता हर नये मोड पर, मेरी मंजिल तो मैं खुद हूँ, इसमें रास्तों

बुलंद होसले राह ए मंजिल को

बुलंद होसले राह ए मंजिल को आवाज़ देते हैं, आओ तुम्हें हम, अपने क़दमों से नवाज़ देते हैं| ऐसे मौके बार-बार मिलते नहीं हैं हर किसी को, कम ही होते हैं, जो जिंदिगी को नये आगाज़ देते हैं| बुलंद होसले राह ए मंजिल को आवाज़ देते हैं… हर मुश्किल का सामना अपना सर उठा के

मुझसे एक सौदा

मुझसे एक सौदा अपनी पूरी कीमत का कर ले जिंदिगी, मुझे यूँ बार-बार किश्तों में जीना मंज़ूर नहीं| जिंदिगी बदलती है क्यों मेरा रास्ता हर नये मोड पर, मेरी मंजिल तो मैं खुद हूँ, इसमें रास्तों का कसूर नहीं| मुझसे एक सौदा अपनी पूरी कीमत का कर ले जिंदिगी… तेरी अपनी ही रवायत है और