Tag: जिंदगी

तुम पर जचता नहीं

मुझ पर दावा-ए-हक का तलबगार न बन, ये शौक़ है ज़माने का, तुम पर जचता नहीं | रोज़ कमाते हैं तब ही रोज़ खाते हैं, महीने के आखरी में, जेब में कुछ बचता नहीं | ये शौक़ है ज़माने का, तुम पर जचता नहीं… बाबूजी की तेरहवी है या फिर बिट्टू की बरात, गरीब के

अपना सर उठाने की

अपना सर उठाने की, एक कीमत होती है, हर किसी को कहाँ नसीब, ये ज़ीनत होती है | ख्वाब तो हर आँख में होते हैं मगर, सब में कहाँ इन्हें जीने की नीयत होती है | अपना सर उठाने की, एक कीमत होती है … मुश्किल हालत से गुज़रते पथरीले रास्ते, हर मंजिल कहाँ ये काबलियत होती है |

इस शहर की दुकानों में

इस शहर की दुकानों में, मुझे बेंच रहा है हुनर मेरा| मैं खरीद रहा हूँ अपने रास्ते, और नीलाम हो रहा है सफ़र मेरा| एक शख्स मेरे अन्दर मुझे, जीस्त की मजबूरियां गिनाता है| मैं ढल रहा हूँ बदलते सांचों में, और बदनाम हो रहा है सफ़र मेरा| मैं खरीद रहा हूँ अपने रास्ते, और नीलाम हो रहा है सफ़र मेरा… वो कौन है जो अब मुझसे, इन साँसों का हिसाब मांगता है | मैं लिख  रहा हूँ

एक-एक रुपया मेरी जेब का

न खैरात में मिला है, न वसीयत काम आई है, एक-एक रुपया मेरी जेब का, गाढ़े पसीने की कमाई है| न शागिर्दी है मिजाज़ में, न बेपनाह हुनर है कोई, मैंने ठोकरें खा-खा कर, अपनी रह बनाई है| एक-एक रुपया मेरी जेब का, गाढ़े पसीने की कमाई है… मेरे पैराहन से खुशबू आती है मेरे

वक़्त मुख़्तसर है

जिंदगी को कज़ा की मोहलत समझिये, वक़्त मुख़्तसर है, वक़्त की अहमियत समझिए| इस खज़ाने का हर लम्हा बाकी से जुदा है, जिंदगी को पल-पल घटती एक दौलत समझिए| वक़्त मुख़्तसर है, वक़्त की अहमियत समझिए… मेरी जुस्तजू है हर एक लम्हा जीने की, मुझे समझिए, मेरी मोहब्बत समझिए | वक़्त मुख़्तसर है, वक़्त की

जाने कब संभलोगे तुम

बार बार उस एक पत्थर से ठोकर खाते हो, गिरना शौक है तुम्हारा, जाने कब संभलोगे तुम| रोज़ उठते हो तुम नये होसलों के साथ मगर, एक ज़माना गुज़र चला, जाने कब बदलोगे तुम| गिरना शौक है तुम्हारा, जाने कब संभलोगे तुम… अभी तुम्हारा खामोश रहना मुनासिब है ‘वीर’, शोला अन्दर भड़का है, अब आग

मैं तुझसे बेवफा ही रहा

बहुत मनाया मगर समंदर खफा ही रहा, जिंदगी तेरा मुजरिम हूँ, मैं तुझसे बेवफा ही रहा| मुझे हासिल हुए कई मकाम रास्तों में, मगर हर रास्ता-रास्ता मुझसे जुदा ही रहा| जिंदगी तेरा मुजरिम हूँ, मैं तुझसे बेवफा ही रहा… .

मंजिलों को खबर कर दो

पांव जमे थे अब तलक, अब कदम बढाता हूँ, मंजिलों को खबर कर दो, मैं उनकी ओर आता हूँ| रंज और गम का सहरा, अब गवारा नहीं मुझको, होसलों के समंदरों में, झूम कर नहाता हूँ| मंजिलों को खबर कर दो, मैं उनकी ओर आता हूँ.. अरसे से तुम्हारा कर्ज़, ढोता हूँ कांधों पर, आज

तुझ में साथ चलने का

मैं तोड़ दूँगा सारी बंदिशें, तुझ में साथ चलने का जिगर रहे| आवारगी कितना भी करे गुमराह, मगर घर तक जाती कोई डगर रहे| सब हासिल कितना बेरंग होगा, जिंदगी में कुछ तो कसर रहे| तनहा रास्तों से कोई डर तो नहीं, बात कुछ और गर कोई हमसफ़र रहे|

तुम आज की बात करो

तुम आज की बात करो| आज जो जुदा है कल से| आज जो पहले कभी नहीं आया है| आज जो फिर कभी नहीं आएगा| यूँ न जीस्त बरबाद करो! तुम आज की बात करो| आज रात ने नया आफताब बनाया है| आज दिन ये नया महताब बनाएगा| तुम भी कुछ नया, कुछ मुख्तलिफ करो| यूँ