Tag: जिंदगी

पिंजड़ा छोड़ कर

जाएगा कहाँ पिंजड़ा छोड़ कर, पाएगा क्या जंजीरें तोड़ कर| मुश्किलें अब जिस्म बन गईं, सोजा सुकूं की चादर ओढ़ कर| नाहक ही ज़ाया किए दिन रात, पाया क्या तूने सर फोड़ कर| सीख क़यामत का राज़ साहिब से, रखते हैं वो करम जोड़ कर| जिंदिगी टुकड़ों में बिखर गई, रखा है हर पन्ना मोड़

एक कमी है अनजानी सी

जिंदिगी लगती है कहानी सी, एक कमी है, अनजानी सी| काटती है पत्थर सालों से, उम्र बहती है, पानी सी| एक कमी है, अनजानी सी| कुछ आशना है उस अजनबी से, सूरत लगती है, पहचानी सी| एक कमी है, अनजानी सी| भूल जाता हूँ मिलके उससे, क्या बात है, बतानी सी| एक कमी है, अनजानी

दो कदम

दो कदम हम चले, दो कदम जिंदिगी| साए से लिपटे हैं, हमराह से, दो कदम गुम चले दो कदम जिंदिगी| इंतज़ार है के ख़त्म नहीं होता, दो कदम कज़ा चले, दो कदम जिंदिगी| शायर नहीं तू फितरत से ‘वीर’ तुने एहसास लिखे, ग़ज़ल लिखी जिंदिगी|

उम्र

किस खता की सजा है ये उम्र, शायद हर वजह की वजह है ये उम्र| एहद ऐ वफा सभी ज़ाया नहीं, यु हीं इंतज़ार को कहते नहीं उम्र| आपके ग़मों का एहसास है हमें, यु हीं महकदे में गुजारी नहीं है उम्र| कभी तो बंदे रूह से पुकारा होता, नाहक ही सजदों में गुजारी है

सवाल

मिलेगा क्या तुम्हें बयाने बेखुदी से, उन सवालों को ज़हन में ही रहने दो| उसूल तुमसे पूछकर नहीं बनाये थे ज़माने ने, कहते हैं जो लोग उन्हें कहने दो| उन सवालों को ज़हन में ही रहने दो… बुझने मत देना शम्मा ए वफ़ा हमसफ़र, जज्बातों को खामोश ही ज़ुल्म सहने दो| उन सवालों को ज़हन

उसके लिए

चला था एक मंज़र लिए, नज़र में एक चेहरा लिए| किसको खबर थी, डूबी कश्ती की, चले थे सब, मौज-ऐ-सेहरा लिए| आज शाम बैठा सोचता हूँ, निकलेगा कल सूरज किसके लिए| वीर, खत्म हो जाये ये दास्ताँ तो अच्छा है, थक गया हूँ, अपने कांधे पे ज़माने लिए|

हम जलते रहे

हाल-ऐ-दिल खुद से कहते रहे, अंगारों से हम जलते रहे| ख़त्म नहीं हुआ मौत से सफ़र, दिलों में हम धडकते रहे| मिलते रहे सभी से मगर, दायरों में हम सिमटते रहे| है आवारगी अपनी फितरत में, रास्तों से हम भटकते रहे| हर मोड़ पे एक नया रंग लेके, मौसमों से हम बदलते रहे| अफवाह उसके

बीते बरस

बीते बरस को याद करें, तरसे कितना उसके लिए, याद करें| उम्र और चली एक कदम, वही ख्वाब रहा हमारा हरदम| कैसे बदले वक़्त और हालात, बात करें| बीते बरस को याद करें … अबके साल इन्हें फिर संजोना होगा, भूले, टूटे, बिछड़े ख्वाब याद करें| बीते बरस को याद करें …. हाकिम बने खुद

बातों ही बातों में

बातों ही बातों में, कट गयी ज़िन्दगी मेरी, कितने रिश्तों में, बट गयी ज़िन्दगी मेरी| अपनी सुध थी ना ज़माने की खबर, इश्क के बाज़ार में, लुट गयी ज़िन्दगी मेरी| बातों ही बातों में, कट गयी ज़िन्दगी मेरी… कुछ वक़्त का तकाज़ा था, कुछ हालात की मजबूरी थी, हर रोज़ बदल गयी, ये शक्सियत मेरी|