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वीरेंद्र शिवहरे (वीर) की शायरी अल्फाजों की सरहदों को पार करके रूहानियत का लिबास पहन लेती है| उनके लफ़्ज़ों में ज़ाहिर होती खलिश की पहचान किसी ना किसी रूप में हम सब ने अनुभव की है|

हर नज़्म पढ़ते वक़्त लगता है जैसे पन्नो पर मेरी ही कहानी का बयाँ है|
जैसे इस ग़ज़ल को ही देखिये –
“जिस्म से रूह तक सब लडखडाता है,
जंग खाया कोई रिश्ता टूटता जाता है”

वीरेंद्र, शायरी के लहजे में ‘वीर’, को पढ़ते वक़्त कई बार लगता है जैसे अपना ही कोई हिस्सा भीतर से बोल रहा हो|
“माज़ी के दाग यादों से जाते क्यों नहीं,
मैं तो भूल चला, ये ज़ख्म मुझे भुलाते क्यूँ नहीं?”

हर रचना अपने आप में अनोखी है और पढ़नेवालों के ज़हन में उथल-पुथल मचाने का साहस रखती है| दर्द की परत उतारकर देखिये तो वीर की खलिश आपको अपने आप में भी जरूर मिलेगी|

यह कविता संग्रह जिस भी हाथ में जाएगा, उस रूह का रंग बेशक ही इसमें नज़र आएगा|

– चंद्रमा