Tag: खलिश

पहचाना सा दर्द था

पहचाना सा दर्द था, मिल चूका था इसे कई साल पहले| भरा हुआ ज़ख्म, फिर अचानक सांस लेने लगा| मानो किसी टूटी हुई टहनी में जडें निकल आयी हों… ज़हन घबराया था, फिर उसी आहट से| पिछले मौसम बहूत कुछ छीना था इसने मुझसे| मेरे दो चेहरे, दो हिस्से हो गए थे| आज और कल,

छुपायें तो छुपायें कैसे

तुमको सबब-ए-गम बतायें तो बतायें कैसे, तुमसे नम आंखें छुपायें तो छुपायें कैसे| अब तलक ढोता हूँ गिरे घर के पत्थरों को, फिर कोई नया घर बनायें तो बनायें कैसे| तुमसे नम आंखें छुपायें तो छुपायें कैसे… जुनून-ए-बेखुदी ने रुसवा किया यारों को, तेरा कोई हमदर्द अब लायें तो लायें कैसे| तुमसे नम आंखें छुपायें

जिस्म से रूह तक

जिस्म से रूह तक सब लडखडाता है, जंग खाया कोई रिश्ता टूटता जाता है| फिर संग लिए अपने कांधों पर, कोई दीवाना घर नया बनाता है| जंग खाया कोई रिश्ता टूटता जाता है… अपने अश्कों की कद्र उसे कब थी, उसकी राहों में फूल बिछाता है| जंग खाया कोई रिश्ता टूटता जाता है…

नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे

बेरुखी का सबब बतायें तो बतायें कैसे, तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे| कोई शख्स हो तो भुल भी जायें हम, खुदको खुदसे भुलायें तो भुलायें कैसे| तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे… जिसकी तामीर में उम्र गुज़ार गयी, उस घर को छोडके जायें तो जायें कैसे| तुमसे नज़र मिलायें तो मिलायें कैसे… आँखों में

जवां हो जाने की

आहिस्ता रख ज़ख्मों पर हाथ सनम, इनकी तासीर है जवां हो जाने की| शमा-ए-मोहब्बत ना रहेगी उम्र भर, इसकी किस्मत है धुआं हो जाने की| इनकी तासीर है जवां हो जाने की.. हर वक्त क्या ढूँढता है लोगों में तू, तुझे बिमारी है गुमां हो जाने की| इनकी तासीर है जवां हो जाने की… मत

आसान ना होगा

नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा, उसकी बेरुखी से कब तू वीर परेशान ना होगा| शायद वहम ही हो उसकी मोहब्बत दोस्त मगर, वहम के बगैर भी दिल को आराम ना होगा| नाज़ुक दिल में सितमगर रखना आसान ना होगा… माना मशहूर है किस्सा मेरी वफ़ा का यारों, कौन आशिक शहर में बदनाम

रोने दो मुझे

अपने दामन में खोने दो मुझे, आज लिपट कर रोने दो मुझे| बड़ी मुद्दत से पथराई हैं आंखें, आज देर तलक सोने दो मुझे| आज लिपट कर रोने दो मुझे… भागते भागते बिछड़ा खुदसे, फिर मुझसा होने दो मुझे| आज लिपट कर रोने दो मुझे… दिल अपनों के दागों से भरा है, हर दाग दिल

ज़ख्म

माज़ी के दाग यादों से जाते क्यों नहीं, मैं तो भुल चला, ये ज़ख्म मुझे भुलाते क्यों नहीं| झटक दूं इन्हें ज़हन से तो साँस मिले, मार तो दिया है मुझे, ज़ालिम दफनाते क्यों नहीं| ना अश्क से सींचा, ना ख्यालों की ज़मीन दी, फिर भी दर्द के ये फूल, मुरझाते क्यों नहीं| क्या तेरा

ना जी पाओगे

ख्यालों से मुझे ना समझ पाओगे, लफ़्ज़ों से मुझे ना पकड़ पाओगे| मेरे दर्द का एहसास तो होगा तुम्हे, मेरी नम आँखों का ना देख पाओगे| मुझे कतरा कतरा बाँट तो लोगे तुम, इन कतरों से मुझे ना जोड़ पाओगे| सुन भी लोगे सदा अगर चाहो तो, मगर मेरी आह को ना सुन पाओगे| मशवरा

सादगी गुमा दी

सादगी गुमा दी माँ मैंने, जिंदिगी उलझा ली माँ मैंने| मिली ना सुकून की बूंद तो, आंख अपनी भिगा ली माँ मैंने| तू कहती थी होसला रख हमेशा, देख उम्मीद की लौ बुझा दी माँ मैंने| बनाता था कभी कागज से कश्तियाँ, देख सारी कश्तियाँ डूबा दी माँ मैंने| आज तू भी अपने दुलारे से