Tag: खलिश

कोई मेरे ख्याल का हुआ

कोई मेरे हाल का हुआ, कोई मेरे ख्याल का हुआ| सबके थे सबब अपने, मुझे उम्र भर मलाल सा हुआ| कोई मेरे ख्याल का हुआ… बंदगी, आशिकी, बेखुदी मेरी, अपने वजूद का सवाल सा हुआ| कोई मेरे ख्याल का हुआ… क्यों कालिख सी है सूरत पर, क्या रंग उस गुलाल का हुआ| कोई मेरे ख्याल

डर मत वीर

डर मत वीर तू इससे भी उभर जाएगा| तेरे ज़हर को पीकर ये लम्हा भी मर जाएगा| रात रोते रोते तू बह गया अगर, सारा जहान तेरे अश्कों से भर जाएगा| काजल से काली सोच है तेरी वीर, शैतान भी तुझसे डर जाएगा| कोई है क्या वहाँ रास्ता देखता, उठ के भला तू क्या घर

काँटा हूँ आपकी चुभन का

लिबास हूँ आपकी घुटन का, काँटा हूँ आपकी चुभन का| कह ना पाया वो बात अपनी, ढूँढता है आसरा सुखन का| काँटा हूँ आपकी चुभन का… सी दिया आपने मेरे लबों को, गवाह हूँ आपके सितम का| काँटा हूँ आपकी चुभन का.. गर लिखता रहा इस जुनून से ‘वीर’, बन जाएगा तू बुत एक वहम

मेरी कलम टूट गई

मैंने बात झूट कही, मेरी कलम टूट गई| अच्छा ही हुआ शायद, ये आदत भी छूट गई| मेरी कलम टूट गई… मेरी हमराह थी वो, मुझसे ही रूठ गई| मेरी कलम टूट गई… ख्वाबों का था खज़ाना एक, जिंदिगी उसे लूट गई| मेरी कलम टूट गई…

सवालों से मुलाक़ात हुई

मेरी सवालों से मुलाक़ात हुई … थोड़े सहमे से थे वो| इंतज़ार कब का दम तोड़ चुका था| जवाब कब आने को थे.. मेरी सवालों से मुलाक़ात हुई … फिर ये सहमे सहमे से क्यों हैं? क्या वजूद का खतरा है इन्हें? किस आहट से इनका दिल डूबा जाता है| कौन है वहाँ? ज़रा परदे

लिखते लिखते आंख भर आई है

लिखते लिखते आंख भर आई है, फिर भी तू एक ग़ज़ल ही कहलाई है| लफ्ज़ तो बस लफ्ज़ ही होते हैं, ज़ाहिर कहाँ इनमें दर्द की गहराई है| लिखते लिखते आंख भर आई है … हर शेर तेरा मेरी तड़प का नतीजा है, हर हर्फ़ में तेरे लिपटी मेरी तन्हाई है| लिखते लिखते आंख भर

लफ्ज़ उधार दे दो

लबों को इज़हार दे दो, कुछ लफ्ज़ उधार दे दो| थम गई जिंदिगी क्यों, वक्त को इंतज़ार दे दो| कुछ लफ्ज़ उधार दे दो.. थक गया इसको ढोते-ढोते, मेरी लाश को मज़ार दे दो| कुछ लफ्ज़ उधार दे दो.. खलिश जो ना जाए उम्र भर, ऐसा एक दर्द यादगार दे दो| कुछ लफ्ज़ उधार दे

दरवाज़े सारे बंद हैं

कोई नहीं आएगा यहाँ, इजाज़त नहीं हैं| आज दरवाजे सारे बंद हैं … अंधेरा है ज़हन में, कमरे की रौशनी मद्धम है … आज दरवाजे सारे बंद हैं … मरासिम सारे यहाँ, सर झुका के खड़े हैं| आज इनका सामना मुझसे है| आज ये जवाब देंगे अपने खोखलेपन का … आज दरवाजे सारे बंद हैं

हमने लबों पे मुस्कुराहट पहनी है

खामोश ज़हन में कैद बेचैनी है, हमने लबों पे मुस्कुराहट पहनी है| मत करो ज़ाया अपने जज़्बात तुम, तकलीफ मेरी मुझे ही सहनी है| हमने लबों पे मुस्कुराहट पहनी है… धुऐं से चुभते हैं मरासिम खोकले, बेबस आंखें रात भर बहनी है| हमने लबों पे मुस्कुराहट पहनी है… इल्म होता मेरी बेखुदी का उसे, क्यों

आपने फ़र्ज़ निभाया है

आपने फ़र्ज़ निभाया है, हम पर क़र्ज़ चढ़ाया है| कभी थोडा कर भी लेते, क्यों सिर्फ प्यार जताया है| हम पर क़र्ज़ चढ़ाया है… बार बार जताकर अहसानों को, आपने हमारा सर झुकाया है| हम पर क़र्ज़ चढ़ाया है… हारेगा तू ही इस रंजिश में ‘वीर’, किसने लकीरों को मिटाया है| हम पर क़र्ज़ चढ़ाया