Tag: जिंदगी

एक दिन तमाम

जैसे की कोई जंग वक्त से लड़के आ रहे हैं, हम पूरा एक दिन तमाम करके आ रहे हैं| अब अपना कुछ कहाँ बाकी रहा है ‘वीर’, सारी जिंदिगी उसके नाम करके आ रहे हैं|

अपने अंदर की आग

जिंदगी को अधूरे ख्वाब चुगने मत देना, अपने अंदर की आग को बुझने मत देना| हर फैसले पर मोहर हो तुम्हारे दिल की, आईने में अपना सर झुकने मत देना| अपने अंदर की आग को बुझने मत देना… है पथरीला रास्ता अपने हौसलों का वीर, मिट जाओ मगर कदम रुकने मत देना| अपने अंदर की

जिंदगी के नाम पर मुझे

मुझे दबा कर ख़ामोशी की सज़ा देते हो, जिंदगी के नाम पर मुझे क़ज़ा देते हो| मैं सर से पाँव तलक डूबा हूँ इश्क में, मुझे किस मर्ज़ से गिला है, मुझे क्या दवा देते हो| जिंदगी के नाम पर मुझे क़ज़ा देते हो… हमें होश आएगा नहीं क़यामत के दिन भी ‘वीर’, हमें जन्नत

जिंदिगी से रूठ कर

जिंदगी से रूठ कर जाएंगे कहाँ, भूलना तो चाहेंगे मगर भूल पाएंगे कहाँ| बदलना चाहेंगे बहुत कुछ मगर, अपने सिवा किसी को बदल पाएंगे कहाँ? जिंदगी से रूठ कर जाएंगे कहाँ…

बात उजालों की

दम होसलों का भरा किजीये, बात उजालों की करा किजीये| नाजुक है ख्वाबों की जमीन, आहिस्ता पाँव रखा किजीये| बात उजालों की करा किजीये… और भी मिल जायेंगे मौके, हालातों पर गौर करा किजीये| बात उजालों की करा किजीये…

कहने दो ना जिंदिगी

वहमों में रहने दो ना जिंदिगी, कहने को कहने दो ना जिंदिगी| ग़मों का दरिया या गिलों की बारिश, हमें हर हाल में बहने दो ना जिंदिगी| कहने को कहने दो ना जिंदिगी… सब दिखता है मेरे अलावा मुझको, मुझे कुछ नए आईने दो ना जिंदिगी| कहने को कहने दो ना जिंदिगी…

हासिल के दायरे

तेरे नाम को हम कब रोते हैं, हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं| ना रख कोई खलिश दिल में, ख्वाब आखिर ख्वाब ही होते हैं| हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं… यही तो दस्तूर है ज़माने का, मिलकर दिल अक्सर जुदा होते हैं| हासिल के दायरे बहुत छोटे हैं… मुन्तज़िर ना छोड़ किसी को ‘वीर’,

प्यासा रहता है

कोई सहरा में एक बूँद ढूँढता है, कहीं सागर भी प्यासा रहता है| कहीं चार लम्हें जिंदिगी बन जाते हैं, कहीं कोई पल पल मरता है| कहीं सागर भी प्यासा रहता है… कभी अश्क पीता है छलकने से पहले, कभी खामोश तन्हा सिसकता है| कहीं सागर भी प्यासा रहता है… कहीं लफ्ज़ कह नहीं पाते

मुसाफिर

कहाँ चला रास्ता रास्ता, मुसाफिर पूछो, क्यों रुका रास्ता रास्ता, मुसाफिर पूछो| जाना है कहाँ और जाता है कहाँ, क्यों बेखबर रास्ता रास्ता, मुसाफिर पूछो| थोड़ी फितरत है और थोड़ी हसरत, क्यों मुड़ा रास्ता रास्ता, मुसाफिर पूछो| मील के पत्थर पर नाम उसका है, क्यों खड़ा रास्ता रास्ता, मुसाफिर पूछो| जब मरेगा तो रास्ता भी

कच्ची नींद का ख्वाब

कच्ची नींद का ख्वाब हसीन होता है, थोडा नमकीन थोडा रंगीन होता है| मचलता है मुमकिन की दीवारों से भिड कर, कभी सांसों सा ज़मीन होता है| कच्ची नींद का ख्वाब हसीन होता है… लबों पर मुस्कुराहट बन नाचता है दिन भर, शाम ढले थोडा ग़मगीन होता है| कच्ची नींद का ख्वाब हसीन होता है…